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Previous birth || Poorva Janm || क्या है आपका पूर्व जन्म || भाग-1 जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति लग्न में हो तो पूर्वजों की आत्मा का प्रभाव दर्शाता है। समय समय पर उनकी उपस्थिति का आभास होता रहता है। ऐसे व्यक्ति कों अमावस्या के दिन दूध का दान करना चाहिए। जन्म कुंडली में यदि दूसरे अथवा आठवें भाव में होने पर व्यक्ति पूर्व जन्म में सन्त होता है या सन्त प्रवृत्ति का होता है. हो सकता है कि कुछ अतृप्त इच्छाएं पूर्ण न होने पर उसे फिर से जन्म लेना पड़ा हो । ऐसे व्यक्ति सम्पन्न घर में जन्म लेते है। उत्तरार्ध में धार्मिक प्रवृत्ति से पूर्ण जीवन बिताते हैं। ऐसे व्यक्ति पर कुछ आत्माओं के आशीर्वाद रहते है। ऐसे व्यक्ति के अच्छे कर्म करने तथा धार्मिक प्रवृति से समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। उनका जीवन साधारण परंतु सुखी होता है। तृतीय भाव में बृहस्पति के होने से पूर्वजों में किसी स्त्री की अकस्मात् मृत्यु हुई होती है और व्यक्ति उसके आशीर्वाद व श्राप से प्रभावित होता है। आशीर्वाद से सुख सुविधाएं व श्राप से परेशानियां भोगनी पड़ती है. ऐसे व्यक्ति को कुल देवी या मां भगवती की आराधना करनी चाहिए. बृहस्पति यदि चतुर्थ भाव में हो तो जातक इसी परिवार का पूर्वज होता है. पूर्वजों के आशीर्वाद से जीवन आनंदमय होता है। श्राप होने से परेशानियां झेलनी पड़ती है. इन्हें हमेशा भय बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को वर्ष में एक बार पूर्वजों के स्थान पर जाकर पूजा अर्चना करनी चाहिए और अपने मंगलमय जीवन की कामना करना चाहिए। नवम भाव में बृहस्पति हो तो पूर्वजों की सहायता मिलती है. ऐसा व्यक्ति वैरागी प्रवृत्ति का होता है. वह त्यागी और सात्विक विचारधारा का होता है. ऐसे व्यक्ति पर ईश्वर कृपा होती है. . दशम भाव में बृहस्पति होने पर व्यक्ति पूर्व जन्म के संस्कार से सन्त प्रवृत्ति का तथा धार्मिक विचारों वाला होता है. वह ईश्वर भक्त होता है. यदि नवम, दशम या एकादश भाव में शनि या राहु भी हो ऐसा व्यक्ति धार्मिक स्थल, या न्यास का पदाधिकारी होता है. वह प्रबंधक हो सकता है. वह अनैतिक तरीकों से आर्थिक उन्नति करता है परन्तु अन्त में ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता हैं। यदि एकादश भाव में बृहस्पति हो तो व्यक्ति पूर्व जन्म में गूढ़ विद्याओं का ज्ञाता होता है. तंत्र मंत्र आदि का ज्ञाता होता है. पूर्व जन्म में किसी को कष्ट देने से दूषित प्रेत आत्माएं परिवारिक सुख में व्यवधान पैदा करती है। मानसिक अशान्ति हमेशा रहती है। ऐसे व्यक्ति को राहु की युति से विशेष परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को मां काली की आराधना करना चाहिए और संयम से जीवन यापन करना चाहिए। द्वादश भाव में बृहस्पति हो, साथ में राहु या शनि का योग हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वजन्म में धार्मिक स्थल को क्षति पहुंचाता है और उसे इस जन्म में क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति को अच्छी आत्माएं साथ देती है। इन्हें धार्मिक प्रवृत्ति से लाभ होता है। ऐसे व्यक्ति को अभक्ष्य भक्षण से बचना चाहिए अर्थात शुद्ध खानपान करना चाहिए. शनि यदि लग्न में हो तो व्यक्ति पूर्वजन्मों में गूढ़विद्याओं का ज्ञाता रहा होगा। ऐसे व्यक्ति को अच्छी आत्माएं सहायता करती है। इनका बचपन कष्टप्रद या आर्थिक परेशानीपूर्ण रहता है। ये ऐसे मकान में निवास करते हैं, जहां पर प्रेत आत्माओं का निवास रहता हैं। ऐसे व्यक्ति को सात्विकता व वैराग्य से लाभ मिलता है. यदि द्वितीय भाव में शनि हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्व जन्म के दुष्कर्मों के कारण शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व पारिवारिक कष्ट भोगता है. यदि राहु भी साथ में हो तो अनिद्रारोग तथा भयानक स्वप्न से कष्ट भोगता है. किसी प्रेत आत्मा की छाया उदृश्य रुप से प्रत्येक कार्य में रुकावट डालती है। कुंडली में यदि शनि या राहु तृतीय या छठे भाव में हो तो अदृश्य आत्माएं भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास करवाने में मदद करती है। ऐसे व्यक्ति भूमि संबंधी कार्य तथा भूगर्भ के कार्यों से लाभ प्राप्त करते हैं. ये लोग कभी-कभी अकारण भय से पीडि़त पाये जाते हैं। चतुर्थ भाव में शनि या राहु पूर्वजों को सर्पयोनी में होना दर्शाता है। इन्हें सर्प से भय लगता है। इन्हें अन्य जीवों की या सर्प की सेवा करने से लाभ होता है। यदि पंचम भाव में शनि या राहु की उपस्थिति हो तो जातक पूर्व जन्म में किसी को घातक हथियार से कष्ट पहुंचाता है. इन्हें सन्तान संबंधी कष्ट उठाने पड़ते हैं। सप्तम भाव में शनि या राहु होने पर पूर्व जन्म संबंधी दोष के कारण शारीरिक कष्ट, परिवारिक सुख में कमी अनुभव में आती है । धार्मिक प्रवृत्ति रखने और अपने इष्ट की पूजा करने से लाभ होता है। अष्टम भाव का शनि या राहु होने से जातक पूर्व जन्म में किसी व्यक्ति पर तंत्र-मंत्र का गलत उपयोग करता है. वह भय से ग्रसित रहता हैं। इन्हें सर्प, चोरों व मृत आत्माओं का भय बना रहता हैं। इन्हें दूध का दान करने से लाभ होता है। नवम भाव में शनि होने से जातक पूर्व जन्म में दूसरे व्यक्तियों की उन्नति में बाधा पहुचाने का कार्य करता है. अत: ऐसे व्यक्ति जीवन में विशेष उन्नति नहीं कर पाते हैं। शनि यदि द्वादश भाव में हो तो जातक सर्प दोष से पीड़ित होता है. इस कारण से आर्थिक हानि होती है। ऐसे व्यक्ति को सर्प दोष की शांति करनी चाहिए. शिव आराधना से भी लाभ मिलता है। जन्म पत्रिका के किसी भी भाव में राहु और शनि की युति हो तो ऐसा व्यक्ति अज्ञात आत्माओं से पीडि़त रहता है। इनके शरीर में हमेंशा भारीपन रहता है, पूजा अर्चना के समय आलस्य आना तथा क्रोधी प्रवृत्ति का होने का दोष पाया जाता हैं। कुंडली के पंचम भाव के स्वामी ग्रह से जातक के पूर्वजन्म के निवास का पता चलता है। पूर्वजन्म में जातक की दिशा का ज्ञान : जन्म कुंडली के पंचम भाव में स्थित राशि के अनुसार जातक के पूर्वजन्म की दिशा का ज्ञान होता है। पूर्वजन्म में जातक की जाति का ज्ञान : जन्म कुंडली में पंचमेश ग्रह की जो जाति है, वही पूर्व जन्म में जातक की जाति होती है।