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Nigraheshwari Dashaka Stotra by Swami Nigrahacharya | निग्रहेश्वरी दशक स्तोत्र | स्वामी निग्रहाचार्य

Nigraheshwari Dashaka Stotra by Swami Nigrahacharya | निग्रहेश्वरीदशक स्तोत्र | स्वामी निग्रहाचार्य | उत्तम गुणवत्तानुभव हेतु हेडफोन का प्रयोग करें | Use Headphone for better experience. || श्रीनिग्रहेश्वरीदशकम् || तारवाङ्मायिकाकाशक्रोधान्विता निग्रहस्याखिलेशी सुराधीश्वरी। या महाशम्भुपर्यङ्कभोगेश्वरी सर्वयोगेश्वरी कालजिह्वावतु॥०१॥ तार, वाणी, माया, आकाश और क्रोध आदि से युक्त, समस्त निग्रहों की स्वामिनी, देवताओं की अधीश्वरी, जो महाशिव की शय्या पर भोग की स्वामिनी हैं, ऐसी सर्वयोगबल की अधीश्वरी कालजिह्वा (निग्रहेश्वरी) मेरी रक्षा करें। पञ्चतन्मात्रभूतेन्द्रियैर्व्यापितेऽसृक्त्वगस्थिप्रवाहेऽन्तमध्यादिषु। चित्स्वरूपेण भूत्वा प्रविष्टा क्रियासु प्रणेतीलिहस्तावतूज्जासनात्॥०२॥ पञ्च तन्मात्रा, पञ्च महाभूत, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय एवं पञ्च कर्मेन्द्रिय से व्याप्त, जिसमें रक्त, त्वचा, अस्थि का प्रवाह विद्यमान् है, ऐसे शरीर के अन्त, मध्य और आदिभाग में (अर्थात् सर्वत्र) चेतनरूप से प्रविष्ट होकर जो उसे क्रियाशीलता की ओर ले जाती है, ऐसी दण्डधारिणी मारणादि अभिचारगत अकालमृत्यु से मेरी रक्षा करें। अक्षपादैरगम्यागदङ्कारिणी या जगत्कारिणी हारिणी तारिणी। सा प्रचण्डाननापि प्रसादोन्मुखी स्नेहिलाक्षुब्धनेत्रा भवेन्निर्भटी॥०३॥ तार्किक जन तर्कबुद्धि से जिसे नहीं जान पाते, जो समस्त रोगों का विनाश करने वाली है, संसार की रचना एवं संहार करने वाली और संसार से उद्धार करने वाली है, वह दृढ निश्चय वाली देवी भयङ्कर मुखाकृति की होने पर भी प्रसन्नमुख वाली बनकर मेरी ओर निरन्तर प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखती रहें। लोहिता शुक्लवर्णासिता वर्णिता चागमे वेदमन्त्रेऽपि लुक्कायिता। प्राङ्गणे वेणुशङ्खानकैरर्चितायासविश्रान्तिदा सिद्धिदा सावतु॥०४॥ जिसे आगमों एवं वेदमन्त्रों में लोहिता, शुक्ला और कृष्णा के नाम से वर्णित करने के बाद भी तत्त्वतः छिपा लिया गया, जो अपने समक्ष बज रहे वेणु, शङ्ख, नगाड़े आदि की आह्लादक वाद्यध्वनि से अर्चित होकर पूजक को क्लेश से शान्ति देती हैं, ऐसी सिद्धिदात्री मेरी रक्षा करें। भैरवेऽमर्षभूपेऽथवा दिग्गजेन्द्रान्तके सालुवे भीषणे पक्षिणि। गण्डभेरुण्डमूर्त्ताववष्वाणनिर्व्याप्यवृत्तिस्थिते चण्डिके पाहि माम्॥०५॥ क्रोध के स्वामी क्रोधभैरव में, अथवा दिग्गजों का विनाश करने वाले नृसिंहदेव में, भीषण पक्षिराज सालुव (शरभेश्वर/आकाशभैरव) में अथवा गण्डभेरुण्ड की मूर्ति में संसार को निरन्तर भक्षण करने की अबाध वृत्ति से जो शक्ति स्थित है, ऐसी हे चण्डिके ! मेरी रक्षा करो। बिन्दुमध्येऽनिलात्मान्विता याकिनीविग्रहाधारसंस्तम्भपट्टोलिका। डाकिनी राकिणी लाकिनी काकिनी शाकिनी हाकिनी कोणषट्के स्थिता॥०६॥ बिन्दु के मध्य में वायुतत्त्व से युक्त याकिनी देवी मण्डलविग्रह के आधारस्तम्भ की नींव के रूप में स्थित हैं। उनके बाहर निग्रहषट्ककोण में डाकिनी, राकिणी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी एवं हाकिनी देवी स्थित हैं। निग्रहाष्टे महामण्डलेऽब्जे निशान्तस्तथा निग्रहो मन्युताम्राक्षदृक्। स्वापतेयस्य जेता विभूतीश्वरः पञ्चमाख्यः करालः सदा मामवेत्॥०७॥ पद्माकार निग्रहाष्टक महामण्डल में निशान्तभैरव हैं। उनके बाद क्रोध से ताम्बे के समान लाल नेत्रों वाले निग्रहभैरव हैं। फिर धन को जीतने वाले धनञ्जयभैरव, धनेश्वरभैरव और पांचवें के रूप में प्रसिद्ध करालभैरव हैं, ये सदैव मेरी रक्षा करें। यस्तुरङ्गाननो यो विपूर्वः करालस्तथा सुन्दरग्रीवयुक्तस्तनुः। भैरवो भीमरूपः किराताशनः कल्मषव्यालपुञ्जञ्च मे भक्षतु॥०८॥ घोड़े के समान मुख वाले बडवामुखभैरव, विकरालभैरव एवं सुन्दर ग्रीवा से युक्त शरीर वाले सुग्रीवभैरव, ये भयङ्कर रूप वाले गरुड़ के समान मेरे पापरूपी सर्पसमूह का भक्षण कर जायें। अक्षिसङ्कूणितेनैव जन्मेजयीश्वर्यक्रव्यादक्रव्यादसिद्धेश्वरैः। पुष्कलैर्बोधिते नक्तकाले जगन्निग्रहेशि सुप्रत्यङ्गिरे रक्ष माम्॥०९॥ "मात्र अपने कटाक्षप्रहार से शत्रुओं को पराजित करने वाली ईश्वरी" इस प्रकार के स्तुतिपरक वचनों से रात्रिकाल में दक्षिण एवं वाममार्ग के सिद्धेश्वरों के द्वारा जिसे जगाया जाता है, ऐसी जगत् का निग्रह करने वाली महेश्वरी प्रत्यङ्गिरे ! मेरी रक्षा करो। लालिकेन्द्रान्तिके ब्रह्मलिङ्गात्मिके पञ्चकृत्याकुले निष्कले निष्कुहे। धर्मवैतंसिकध्वंसिनीद्वत्सरेशीशपूज्ये सुभद्रे नमामो वयम्॥१०॥ महिषासुर का अन्त करने वाली, ब्रह्मचिह्न से युक्त तत्त्व वाली, सृष्टिस्थितिसंहारनिग्रहानुग्रहसंज्ञक पञ्चकृत्य में व्यस्त, कलादि विभाजन से रहित, अत्यन्त गुप्त, स्वयं को धार्मिक के रूप में प्रचारित करने वाले कपटी अधार्मिकों का विध्वंस करने वाली, कालचक्र की स्वामिनी, महादेवों के द्वारा सुपूजित, मङ्गलमयी देवि ! आपको हम प्रणाम करते हैं। || इति श्रीमन्निग्रहाचार्यकृतं निग्रहेश्वरीदशकम् || स्तोत्रकार एवं स्वर - निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु Like, Share, Subscribe https://www.shribhagavatananda.guru यदि आप इस प्रवाह पर उपलब्ध वक्तव्यों के बदले किसी प्रकार की आर्थिक सेवा निवेदित करना चाहते हैं तो आप निम्न विवरण पर अपनी इच्छानुसार धनराशि का भुगतान कर सकते हैं। If you want to provide any financial support for the videos of this channel, you may pay the desired amount at these details. Shri Bhagavatananda Guru Bank of Baroda Ratu Chatti Branch 54240100000958 IFSC - BARB0RATUCH (कोड का पांचवां वर्ण शून्य है | Fifth letter of code is Zero) UPI - nagshakti.vishvarakshak@okaxis

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