У нас вы можете посмотреть бесплатно हम पंछी उन्मुक्त गगन के || HUM PANCHHI UNMUKT GAGAN KE|| हिंदी कविता || शिवमंगल सिंह ‘सुमन’|| Aahana или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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#HindiKavita #Humpanchhiunmuktgaganke #Aahana #CBSEClass7 #Vasant हम पंछी उन्मुक्त गगन के / शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो। सन्दर्भ : शिवमंगल सिंह सुमन की इस कविता में पंछी हम मनुष्यों से यह प्रार्थना कर रहे हैं की वो उन्मुक्त (खुले) गगन (आकाश) में रहने वाले प्राणी हैं, उनको पिंजरे में ना कैद किया जाए । इस कविता के माध्यम से पंछी यह संदेश देना चाहते हैं कि स्वंतत्रता सब को प्रिय होती है और स्वंतत्र रह कर ही हम अपने सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं। If you enjoy my videos- please ❤️Like ❤️Share ❤️Subscribe ❤️Comment!! ❤🥰🥰 ❤ Thank you all for your support ❤🥰🥰 ❤ 💖💖Don't forget to subscribe, like, and leave a comment.💖💖 🔔 Turn on notifications to stay updated with new uploads!🔔