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दयामय! दया चहौं नहिं न्याय। नहिं पैहौ प्रभु! पार न्याय करि, एतिक मम अन्याय। बिनु जाने अपराध करत जो, सोऊ दंडहिं पाय। पुनि जो जानि जानि कर पापन, नाथ! कौन गति वाय। न्याय होत जग हूँ, पै तुम तो, करुणाकर कहलाय। कहत 'कृपालु' न चतुराइहिं कछु, देखहु उर पुर आय॥ भावार्थ -हे दयामय! मैं आपसे न्याय नहीं, बल्कि केवल आपकी दया की भिक्षा माँगता हूँ क्योंकि न्याय की कसौटी पर मैं कभी खरा नहीं उतर सकता। हे प्रभु! यदि आपने मेरे कर्मों का न्याय करना शुरू किया, तो मेरा उद्धार कभी नहीं हो पाएगा क्योंकि मेरे पाप और अन्याय अनगिनत हैं। संसार का नियम तो यह है कि जो अनजाने में भी अपराध करता है, उसे भी दंड भुगतना ही पड़ता है। परंतु हे नाथ! मैंने तो सब कुछ जानते हुए भी बार-बार पाप किए हैं, ऐसी स्थिति में न्याय के मार्ग से मेरी क्या सद्गति होगी? अर्थात मेरा पतन निश्चित है। इस संसार में तो न्याय और दंड की प्रधानता होती ही है, पर आपकी विशेषता तो यह है कि आप 'करुणाकर' (करुणा की खान) कहलाते हैं। श्री 'कृपालु' जी महाराज कहते हैं कि हे प्रभु! मैं यह सब किसी चतुराई या दिखावे के लिए नहीं कह रहा हूँ, आप स्वयं मेरे हृदय के भीतर आकर देख लीजिए कि मैं अपनी भूलों पर कितना लज्जित हूँ और आपकी कृपा का कितना अभिलाषी हूँ। 44 Dayaamay Daya chaho naha nyay Suswari Didi P-88#vrindavanrassiddhant#premrasmadira deny Madhuri#jagadguruttam shri kripalu Ji Maharaj