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रामचरितमानस मूलपाठ: उत्तरकाण्ड प्लेलिस्ट • रामचरितमानस मूलपाठ:उत्तरकाण्ड सो. गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥ ६८(क) ॥ मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि। चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन। ६८(ख) ॥ देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥ सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥ जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई ॥ जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥ सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥ निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा ॥ संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥ राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥ दो. सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग। पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥ ६९(क) ॥ श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास। पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥ ६९(ख) ॥ बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥ सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे ॥ तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया ॥ पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥ तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं ॥ नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी ॥ मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही ॥ तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥ दो. ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥ ७०(क) ॥ श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥ ७०(ख) ॥ गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥ जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा ॥ मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा ॥ चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया ॥ कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥ सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी ॥ यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥ सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥ दो. ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ॥ सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥ ७१(क) ॥ सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोऽपि ॥ ७१(ख) ॥ जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा ॥ सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा ॥ ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥ अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता ॥ निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥ प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥ दो. भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥ ७२(क) ॥ जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥ ७२(ख) ॥ असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥ जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी ॥ नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥ जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥ नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥ बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥ हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥ मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥ ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं ॥ दो. काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३(क) ॥ निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३(ख) ॥ सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥ राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥ ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥ सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना ॥ ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी ॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं ॥ दो. काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३(क) ॥ निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३(ख) ॥ सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥ राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥ ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥ सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना ॥ ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी ॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं ॥ दो. जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर। ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ ७४(क) ॥ तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि। तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥ ७४(ख) ॥ https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherl...