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ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय॥ धरे गोपिका भेष महेश, कृष्ण प्रेम दे दो लवलेश। तुम्हरी कृपा कोर लवलेश, हौहूँ पड़हूँ रास प्रवेश॥ सुन लो भोलेनाथ उमेश, मुक्ति न चह, चह प्रेम ब्रजेश। मंगलभवन अमंगल भेष, मोहूँ लै चलु सोइ ब्रज देश॥ करौं टहल निशिदिन राधेश, उर न रहे निज सुख लवलेश। सिखवहु तांडव नृत्य विशेष, नाचि नाचि रिझवहुँ प्राणेश॥ तुम अवढर दानी विश्वेश, करहु ‘कृपालुहिं’ कृपा उमेश॥ सरल भावार्थ-"हे महेश! आपने श्रीकृष्ण के महारास में सम्मिलित होने के लिए स्वयं एक सखी (गोपिका) का रूप धारण किया है। आप उस दिव्य गोपी-प्रेम के मर्मज्ञ (जानकार) बन चुके हैं, इसलिए अब मुझ पर कृपा कीजिए और उस अनन्य 'कृष्ण प्रेम' का एक छोटा सा अंश (लवलेश) मुझे भी दान कर दीजिए।" तुम्हरी कृपा कोर लवलेश...: आपकी कृपा की एक हल्की सी दृष्टि मिल जाए, तो मैं भी इस दिव्य 'रास' में प्रवेश पा सकूँ (अर्थात दिव्य भक्ति का अधिकारी बन सकूँ)। सुन लो भोलेनाथ उमेश...: हे भोलेनाथ! मेरी विनती सुनिए। मुझे मोक्ष या मुक्ति नहीं चाहिए, मुझे तो बस ब्रजराज श्रीकृष्ण का प्रेम चाहिए। मंगलभवन अमंगल भेष...: आपका स्वरूप (भस्म, नाग आदि) भले ही सांसारिक दृष्टि से अमंगलकारी दिखता हो, पर आप स्वयं कल्याण के धाम हैं। मुझे भी उसी ब्रज भूमि में ले चलिए जहाँ कृष्ण की लीलाएँ होती हैं। करौं टहल निशिदिन राधेश...: मैं रात-दिन श्री राधा-कृष्ण की सेवा (टहल) करना चाहता हूँ। मेरे हृदय में अपने निजी सुख की इच्छा बिल्कुल समाप्त हो जाए। सिखवहु तांडव नृत्य विशेष...: (रास में नृत्य के लिए) आप मुझे अपना विशेष तांडव नृत्य सिखा दें, ताकि मैं नाच-नाचकर अपने प्राणप्रिय कृष्ण को प्रसन्न कर सकूँ। तुम अवढर दानी विश्वेश...: हे विश्व के स्वामी! आप तो 'औढरदानी' हैं (बिना मांगे सब कुछ दे देने वाले)। मुझ 'कृपालु' (भक्त) पर अपनी कृपा कीजिये। Om Namah Shivay-SK#vrindavanrassiddhant#Sivratri Shpesl#kripalu mahaprabhu#brajrasmadhuri#sivbhajan