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#Shri_guru_mandir_nangli_sahib_langar_bhavan #नंगली_तीर्थ_की_रसोई_देख_सब_हैरान नंगली तीर्थ की रसोई देख सब हैरान नंगली तीर्थ की आधुनिक रसोई देख सब हैरान nangli sahib history in hindi Making of food in nangli tirth for langers Kitchen of nangli sahib meerut Nangli sahib tirath langar bhavan inside view Nangli tirath me langer ghar ki rasoi श्री नंगली वाले सदगुरु के दर्शन से दूर होते हैं कष्ट इसे श्री नंगली वाले सदगुरु जी की महिमा ही कहेंगे कि उनको समर्पित सत्संग सम्मेलन रविवार 21 सितंबर को शहर में होगा। जिसकी तैयारियां व्यापक स्तर पर जारी हैं। परम अराध्य सदगुरु जी का पावन समाधि मंदिर श्री नंगली साहिब दिल्ली-हरिद्वार हाइवे पर यूपी के जिला मेरठ में कस्बा सकौती टांडा से करीब सात किमी की दूरी पर स्थित है। मान्यता है कि इस पावन तीर्थ स्थल के दर्शन करने से जीवन में लक्ष्य की प्राप्ति के साथ सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। पावनस्थल के मार्ग की महत्ता : पावनसमाधि मंदिर तक जाने वाले घुमावदार सड़क पर चौरासी मोड़ है। मान्यता है कि ये मोड़ चौरासी लाख योनियों के प्रतीक हैं, जिसके चलते पावन यात्रा करने से जीवन में चौरासी का बंधन भी कट जाता है। सकौती टांडा से वहां तक पहुंचने के लिए गुरु दरबार की बसें भी चलती हैं। हर पूर्णिमा प्रमुख भंडारों के मौके पर रेलवे द्वारा जालंधर सुपरफास्ट और शालीमार एक्सप्रेस ट्रेन को सकौती टांडा स्टेशन पर रोका जाता है। पावन समाधि मंदिर सोने के कलशवाला संगमरमर से बना है। जिसके दर्शन करने दूरदराज से भक्त पहुंचते हैं। नंगली में रहते हुए सदगुरु जी के फरमान से इस स्थान पर लगे नलके का पानी पीने से बीमारियों का नाश होता है। यहां सदगुरु जी का लंगर भी आठों पहर चलता रहता है। सदगुरुजी की जीवन लीला : सदगुरुजी ने दिसंबर 1935 ईसवी में पदार्पण कर इस भूले-बिसरे गांव का भाग्य चमकाया था। सदगुरु जी 6 अप्रैल, 1936 को पार्थिव काया छोड़कर निज स्वरूप में लीन हो गए थे। उनके समाधि स्थल पर ही भव्य मंदिर बना है। सदगुरु जी का शुभ अवतरण उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत के जिला कोहाट के छोटे से कस्बे टेरी में हुआ था। उनमें महापुरुष के लक्षण बचपन से ही प्रकट होने लगे थे। वह बचपन में खेल-खेल में समान आयु के बच्चों से भजन कराते, प्रभात की अमृत वेला में बड़े बूढ़ों को जगाते आैर मंदिर-गुरूद्वाारों में जाकर सत्संग सुना बंद मुट्ठी का हाल बताते थे। तीन महीने की अवस्था में ही वह देवी मंदिर के चबूतरे से अलोप हो गए। तीसरे दिन मंदिर के उसी स्थान पर प्रकट हुए, जहां एक फनधारी नाग ने उनके इर्द गिर्द घेरा डाल रखा था। साधन भजन में उनकी लगन देखकर गुरूदेव परमहंस दयाल जी ने संन्यास भेष देकर उनको श्री स्वामी रूपानंद जी का नाम प्रदान किया।