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1 )ईश्वर की प्रेरणा से हुई सृष्टि कारण रचना "सर्ग" है 2 )नारायण (ईश्) के प्रथम आत्मज ब्रह्मा जी द्वारा सृष्ट यह जीव जगत आदि " विसर्ग " है ; 3) नाश की तरफ अग्रसर सृष्टि में स्थायित्व श्री विष्णु श्रेष्ठतर हैं " स्थान " यही है ; 4 ) सृष्टि में भक्तों को सुरक्षित रखने के लिए उन पर कृपा करना " पोषण " है 5) मनु आदि ब्रह्मा के पुत्रों द्वारा प्रजा पालन आदि का धर्म अनुष्ठान आदि " मनवन्तर " है ; 6 ) भगवान नारायण के अवतारों की भक्तों के हित में कथाएँ " ईशकथा" है ; 7 ) जब योग-निन्द्रा में श्रीनारायण सोते हैं तब सम्पूर्ण जीव सउपाधि उनमें लीन हो जाते हैं यह " निरोध " है , 8) अज्ञानतावश जीव कर्ता अपने को मानता है ; भोक्ता अपने शरीर इद्रिय आदि को तथा वर्तमान शरीर को " मैं हूँ " मानता है जो झूँठ है सपने की तरह से - अतः परमात्म -स्वरूप में ( जो मूल सत्य है ) में स्थित होना "मुक्ति " है; 9) ईश्वर ; जीव तथा जगत (universe ) तथा क्रियाएँ जिस तत्त्व से प्रकाशित होते हैं वह ब्रह्म ( परमब्रह्म) है जिसे "आश्रय" कहा गया है यही परमात्मा है । 10) परमात्मा ( ब्रह्म ) का आश्रय स्वयं परमात्मा (ब्रह्म ) ही है (दूसरा कोई नहीं ) यह " परम आश्रय " है । " तथा नारायण कौन हैं? कैसे और क्या प्रकट हुए इत्यादि इस वीडियो ( स्कन्ध 2 अध्याय 9 ) में वर्णित है... अवश्य देखिए / सुनिये ! / समझिए !..🙏🏻🌹🌹💐🦚🦚🌟🌟🦚🦚💐💐🌹🌹🙏🏻