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ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे ,,, जहाँ हलचल नहीं है कोई जीव रे,,, जहाँ हलचल नहीं है कोई अपने से मत रह अनजाना , अपने से न हो वेगाना, मिथ्या भ्रम अज्ञान को तजकर, ज्ञान का दीपक अब तो जलाना, मुक्ति पुरी में कदम बढाना।। जीव रे,,,जहाँ हलचल नहीं है कोई ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे ज्ञान की धारा अविचल बहती, अविनाशी सत्ता है रहती, नाशवान पर्याये भी तो , जिसके बाहर - बाहर रहती, पर्यायों में रुक न जाना।। जीव रे,, जहाँ हलचल नहीं है कोई ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे चक्रवर्ती सा पुण्य फला है, कहान गुरु सा गुरु जो मिला है जाग्रत मेरा पुरूषार्थ हुआ है,, निजातम का भान हुआ है, मिल गया मुझको मेरा ठिकाना।। जीव रे,, जहाँ हलचल नहीं है कोई ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे राग का कण भी भट्टी सा लगता, आतम प्रभु जिसे प्यारा लगता, रस नीरस उसका हो जाता.,।आनंदमय प्रभु दृष्टि में आता , दृष्टि पल भर भी नहीं हटाना, जीवरे ,,,जहाँ हलचल नहीं है कोई ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे तन मंदिर में देव विराजे, परमातम प्रभु पूज्य है राजे , इसकी पूजा करले अब तू , ये प्रसन्न क्षण में हो जाये, पंच प्रभु सा रूप है तेरा, जीव रे,, जहाँ हलचल नहीं है कोई ठहरे हुए आतम पे दृष्टि तो डाल, जीव रे ,,,जीव रे,, जहाँ हलचल नहीं है कोई