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पद रत्नाकर पद-193 बिराजत रासेस्वरि-रसराज। गौर-स्याम तन नील-पीत पट सजे मनोहर साज ॥ चंचल चपल नैन की चितवनि चित उपजावत मोद। मधुर बचन रसभरे परस्पर कहि-कहि करत बिनोद ॥ कलित केलि कमनीय अलौकिक रस-आनंद अनूप। पल-पल बढ़त भाव-माधुरि सुचि, विकसत नव-नव रूप ॥ हे सखी! आज निकुंज की छटा निराली है। देख, सम्मुख 'रासेश्वरी' श्री लाड़ली जी और 'रसराज' मेरे प्रीतम श्यामसुंदर एक साथ 'बिराजत' (सुशोभित) हो रहे हैं। दोनों के मिलन की यह शोभा हृदय को मथ रही है। १. अद्भुत छवि और साज-श्रृंगार देख सखी, गौर वर्ण की किशोरी जी और श्याम वर्ण के लाल का यह 'गौर-स्याम तन' कैसा दिव्य आभा बिखेर रहा है! प्रिया जी ने 'नील' पट धारण किया है और प्रियतम ने 'पीत' पट। इन 'नील-पीत पट' की परस्पर आभा ऐसी लग रही है मानो घनघोर घटा में बिजली कौंध रही हो। इनका यह 'मनोहर साज' (श्रृंगार) देख, ऐसा लगता है जैसे सुंदरता स्वयं साकार हो गई हो। २. चितवन और नैनों की चंचलता अरी सखी! इनके 'चंचल चपल नैन' तो देख! एक पल को भी स्थिर नहीं होते। प्रिया-प्रियतम की वह तिरछी 'चितवनि' जब आपस में टकराती है, तो मेरे 'चित' (हृदय) में असीम 'मोद' (परमानंद) उत्पन्न होता है। उनकी आँखों की वह शरारत और प्रेम भरी दृष्टि देख मेरा मन वहीं अटक गया है। ३. परस्पर विनोद और मधुर वार्तालाप सुन सखी! वे एकांत में चुप नहीं हैं। वे 'परस्पर' (एक-दूसरे से) 'मधुर बचन' कह रहे हैं। उनके शब्द कोरे शब्द नहीं, बल्कि 'रसभरे' अमृत की धारा हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर 'एक-दूसरे से परिहास कर रहे हैं, ठिठोली कर रहे हैं। प्रियतम कुछ कहते हैं तो प्रिया जी मुस्कुरा देती हैं, और किशोरी जी के वचन सुनकर रसराज निहाल हो रहे हैं। ४. अलौकिक रस और नित्य नवीनता हे सखी! इनकी यह 'कलित केलि' (सुंदर क्रीड़ा) कितनी 'कमनीय' और 'अलौकिक' है! इस संसार का कोई सुख इसके सामने कुछ भी नहीं, यह 'रस-आनंद अनूप' है। सबसे अनूठी बात तो यह है सखी कि यह प्रेम कभी पुराना नहीं पड़ता। 'पल-पल बढ़त भाव-माधुरि सुचि'—उनकी यह पवित्र प्रेम-माधुरी हर क्षण बढ़ती ही जा रही है और हर पल उनके 'नव-नव रूप' विकसित हो रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे मैं इन्हें पहली बार देख रही हूँ! 193 birajat rajeshwari Rasraj#vrindavanrassiddhant #padratnakar#shri radhamadhav swrup Madhurigayan