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ओ मन सुन ले सच्ची बात, तू ना तन है ना ही नाम ज्योति अमृत रूप है तेरा, अंदर तेरा असली धाम माधव शरण, माधव शरण बस इतना तू जान लहरें उठती विचारों की, तू समुंदर का निर्वाण जो कुछ दिखता आँखों के आगे, सपना जैसे भल जिस पल जागे सत्य के अंदर, खुल जाए हर जंजाल माधव शरण, माधव शरण हर सांस में उसकी डोर जीवन की इस भीड़ भरी राह में, वही तेरा मन जोर ये तन टेढ़ा मन उलझा सा, ये सब क्षण भंगुर श्रृंगार रूप रंग सब बदल रहा है, तू तो नित्य आधार जो बस तन में दोष ही देखे, वो क्या देखेगा गन छिद्र गिने जो दूसरे तन के, खो दे अपना जीवन दे तो कपड़े जैसे बदले, कल कुछ और आज कुछ और अंदर जो स्थिर ज्योति जलती, उसका ना कोई शोर जब मन के आंगन में जाकर, तू ये बात समझाए मैं ना तन हूँ, मैं ना मन हूँ, बंधन खुद ही गिर जाए माधव शरण, माधव शरण जब ये राज खुलेंगे दे बुद्धि की सारी जंजीरें, खुद ही टूट के गिरेंगे सुख हो दुख हो मान हो अपमान हो, आने दे सब धार तू बस बैठ के देख तमाशा, जैसे नदी के पार हंसना रोना रोष तिरस्कार, मेले जैसी गूंज तू तो नित्य उपस्थिति है, तू ही सच्ची पूंज हाथ करे जो कर्म तेरे, दिल को दे ये संदेश मैं ना करता मैं ना भूकता, मैं हूँ केवल देश क्रोध उठे जब ढेर या बन जा, लोभ पे हंस के देख ईर्ष्या आए धुएं की तरह, तू आकाश बन एक जब जब जल्दी फैसले करे मन, तू ठहर के सांस ले एक पल साक्षी बन कर देख, फिर बात अलग ही होवे माधव शरण, माधव शरण ऐसा बने समां राज सिंहासन बाजार कोठरी, सब एक सा जंजाल ओ मन सुन ले सच्ची बात, तू ना तन है ना ही नाम ज्योति अमृत रूप है तेरा, अंदर तेरा असली धाम प्रश्न उठता जीवन में जब, कर्तव्य अनुभव कैसे ये द्वंद्व निर्णय संघर्ष सही दिशा जाऊं कैसे भीतर से आवाज ये आई, कर्म कर लोक हित में मन को रख निष्काम निरालेप, जुड़ जा परम चित में घर हो दफ्तर राज हो, सेवा का सब विस्तार अपने फायदे से ऊपर उठ के, रख सिर्फ धर्म का प्यार भीतर शून्य या बाहर करुणा, ऐसी हो तेरी चाल भीतर माधव बाहर सेवा, यही तेरा उच्च काल जब तन टूटे थक जाए दिल, सांस भरी नए अनगीले तब भी जिसका समता ना टूटे, उसके बंधन सब ढीले माधव शरण, माधव शरण इस मंत्र की ये रीत जो भी इसको जीवन जी के, वही बनेगा गीत ड्यूटी भारी वार्ड में दौड़, फाइलें रिपोर्ट इलाज रातों की बेनींद सफर में, कभी लगे अंधेरा राज तब दिल के अंदर