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सोनौली से काठमांडू के लिए बस में चढ़ा। रात भर का थका था। सीट मिलते ही ऊँघने लगा। आँखें बंद हो रही थी कि लगा रातरानी देह से लिपट रही है। सर उठाया तो देखा एक लड़की बगल में सीट का सहारा लेकर खड़ी है। मैंने नज़र भर उसे देखा। बड़ा-सा चेहरा। छोटी-छोटी गोल आँखे। मानो हार में दो नगीने जड़े हों। मैं फिर ऊँघने लगा। पर उस रातरानी की गंध ने सोने नहीं दिया। हारकर खड़ा हुआ और लड़की को सीट पर बैठने का इशारा किया। लड़की इतनी थकी थी कि औपचारिक इंकार भी नहीं कर पाई। कुछ दो घण्टे बाद उसकी नींद खुली। उसे मेरा ख़्याल आया। अब वो खड़ी हुई और मुझे बैठने का इशारा किया। ऐसे ही जागते-सोते आधा सफ़र कटा। मेरे बगल वाली सीट खाली हुई फिर उसने मुझे बैठने को कहा। मैं खिड़की की तरफ बैठा था। खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। पहाड़ खत्म होते तो देवदार के जंगल दिखते। नेपाल के सौंदर्य ने मन मोह लिया। " काठमांडू कितनी दूर है? " मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा। उसने सुना। हँसी। चौंककर हँसी। शायद हिंदी सुनकर हँसी। फिर लगभग हँसते हुए कहा- " दूर बहुत दूर " अबकी मैं चौंका। उसे हिंदी आती थी इस पर नहीं ! अपनी नादानी पर। आगे उससे बात अंग्रेजी में की। मैंने उससे इंटरनेट माँगा, उसने दिया। इधर घर पर बता दिया कि सुरक्षित नेपाल की सीमा में पहुँच गया हूँ, आगे सूचित करूँगा। हमने एक-दूजे से बातें की। उसने नेपाल के बारे में बताया। मैंने भी उसे भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाया। उसने अपने नाम का अर्थ बताया- जिसे भूला न जा सके। सचमुच। आगे बताया: उसे ये नाम उसके नाना जी ने दिया था। नाना जी भारतीय सिनेमा बहुत देखते थे। किसी फिल्म के चरित्र से प्रभावित होकर उसे नाम दिया था। कुछ घण्टे बाद उसका स्टॉप आ गया। उसके उतरते ही रातरानी भी मेरी देह छोड़ गई। मोजों की सड़ी गंध बस की बची जगह छेंकने लगी। गनीमत ये रही कि मेरा भी स्टॉप कुछ समय बाद आ गया। एक बात और। हम दोनों फेसबुक से कनेक्ट हो चुके थे। मैं काठमांडू उतरा। गेस्ट हाउस में ठहरा। शाम हो चुकी थी। फ्रेश होने के बाद फोन चेक किया। फेसबुक पर एक मैसेज था- " तुमने अपने नाम का मतलब नहीं बताया ! " मुझे लगा सिर्फ मैं ही उस आँख को नहीं भूल पा रहा हूँ। गौरेया-सी छोटी आँखे। ख़ुशी हुई कि उसे भी याद हूँ। वरना तो अधिकतर साथ सफ़र तक ही रहता है। हॉटेल का इंटरनेट था। ख़ूब बातें हुईं। उसे बताया कल काठमांडू देखूंगा। मिलने की बात रखा। उसने बताया कल उसकी माँ पशुपति टेम्पल जा रही हैं। तय हुआ। मैंने पूछा बिना इंटरनेट के बग़ैर मैं तुम्हें वहाँ मिलूंगा कैसे? उसने बताया मंदिर के पीछे एक नदी है- बागमती। उसके पीछे बहुत शांति है। एकदम भीड़ नहीं रहती। वहीं मिलूंगी। अगली सुबह मैं जल्दी उठा। नहाकर कपड़े पहने और बस पकड़ कर मंदिर पहुंचा। बारिश हो रही थी। भीग गया। मंदिर से होते हुए पीछे पहुँचा। सच में शांति। उधर मंदिर के बाहर शोर और इधर शांति। पुल पार करके पहुंचा। देखा तो बेंच पर बैठी थी। मैं भी बगल में बैठा। रातरानी फिर देह से लिपट गई। " रेनकोट नहीं लाए थे? " उसने भीगी देह देखकर पूछा। " पता नहीं था बारिश होगी। " मैंने कहा। " पता तो मुझे भी नहीं था तुम लेट करोगे " उसने शिकायती-ढंग से कहा। दोनों हँसे। साथ टहले। उसने बताया उसकी माँ हर बुधवार यहाँ आती है। जितने देर वो मंदिर रहती हैं, वो यहाँ पीछे बैठी रहती है। " कब तक यहाँ रहोगे? " उसने पूछा। " आज रात पोखरा के लिए निकलूंगा" मैंने कहा। "ठीक है। पोखरा सुंदर जगह है। पर काठमांडू भी घूमना " उसने ये कहते हुए दो-तीन जगहों के नाम बता डाले। हम थोड़ा और पीछे गये। वहाँ एक पेड़ था। पेड़ के नीचे कैंटीन। हम बैठे। नाश्ता किए। उसने बताया कि वो इंडिया आएगी। मैंने उसे बनारस घुमाने का वादा किया। फिर वहां से उठकर नदी के पास बैंच पर बैठे। नदी के इस पार से मंदिर का पिछला हिस्सा दीखता है। थोड़ा ऊपर से देखेंगे तो काठमांडू दिखेगा। नदी के उस किनारे घाट हैं। जहाँ शवदाह होता है। बहुत भव्य तरीके से शव लाए जाते थे और अंत्येष्टि होती थी। मैंने डायरी निकाली और लिखा- " मैं चाहता हूँ जब मैं मरूं तो मेरा दाह-संस्कार भी ऐसे ही हो। जलने के बाद बची राख खेतों में छींट दी जाए और फिर मैं गेहूं की कच्ची बालियों में दूध बनकर जन्म लूँ। " " मृत्यु क्या है? उसने डायरी लेते हुए पूछा। " इच्छाओं का अंत! " मैंने जवाब दिया। " और फिर भी तुम चाहते हो कि मरने के बाद तुम्हारी इच्छाओं का सम्मान किया जाये " उसने लिखे पर हँसते हुए कहा। मैं भी अपने विरोधाभास पर हँसा। डायरी से पन्ना फाड़ दिया। बात ही कर रहे थे तभी उसका फोन बजा। माँ का था। वो उठी। पास आई। मैंने पाया रातरानी पूरी देह से उतरकर होठों पर आ गई है। मैंने उसकी आँखें देखीं। ' मैंने भी उन आँखों में मिलने के वादे के बावजूद आख़िरी मुलाक़ात देख ली। एक बाय के साथ वो मुड़ी। मैंने उसे जाते देखा। रातरानी होठों से उतरकर उसके साथ हो ली। मौसम अकेलेपन से भर गया। मैं काफ़ी देर तक वहीं खड़ा रहा। भीत की तरह। जड़वत। उसके जाने के बाद मैंने कुछ तस्वीरें ली थी, आज मैं तो उन तस्वीरों को देख रहा हूँ। अकेलेपन से भरी हुई तस्वीर।अकसर जब भी इसे देखता हूँ गौरैया की आँखे याद आती हैं। रातरानी की गंध याद आती है। याद आता है उसका कहना: " तुम कविताएँ लिखते हो न? मैं तुम्हें मिलती रहूंगी। रोज़। गेंहू की बालियाँ देखोगे तो मेरा ख़याल आएगा। रातरानी देखोगे तो मेरा ख़याल आएगा। अकेलेपन से भरोगे मेरा ख़याल आएगा। हम कहीं-न-कहीं मिलते रहेंगे। " आज उसका नाम याद आ रहा है, जिसका मतलब था -जिसे भूला ना जा सके। नहीं भूल पाया। Writer - नीरव Voice - Pankaj Jeena Video - @neeraj.creation