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आज मैं राहु नामक ग्रह पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। यह तमो ग्रह है। इसके अनेक पर्याय हैं। यथा-"तम असुर अग सर्प फणि सैंहिकेय स्वर्भानु विधुंतुद ।" राहु = रह् भ्वादि.परस्मै, चुरादि उभय रहति, रहयति ते + उण्। जो रहित करता है, वश्चित करता है उसका नाम राहु है। जो राहु से ग्रस्त है, वह राहुल है। राहुल= अशक्त, जड़। जिस भाव वा राशि में राहु है, वह भाव वा राशि राहुल है। 'यथा नाम तथा गुणः की उक्ति से राहु जिस स्थान में है, जातक को उस स्थान के फल से वञ्चित कर देता है। लग्नस्थ राहु स्वास्थ्य छीन लेता है। द्वितीयस्य राहु धन ले लेता है। तृतीयस्थ राहु अनुज से वञ्चित करता है। चतुर्थस्थ राहु सुख हरता है। पञ्चमस्थ राहु पुत्र की हानि करता है। षष्ठस्थ राहु शत्रु वा रोग का अपहरण करता है। इसलिए बहुत अच्छा / अतीव शुभद है। सप्तम का राहु स्त्री से होन करता है। अष्टम का राहु मृत्यु को दूर करता है। नवम का राहु धर्म छीन लेता है। दशम का राहु यश से च्युत करता है। एकादश का राहु पत्नी का गर्भ नष्ट करता है तथा ज्येष्ठ भ्राता को भी नष्ट करता है। द्वादश भाव का राहु व्यय का लोपन (कृपण) करता है। इसलिये शुभदायक है। इससे यह निष्कर्ष निकला, जितने भी दुःस्थान हैं उनमें राहु शुभ फलद है। राहु दुष्ट ग्रह है।( 6,8,12) दुष्ट स्थान हैं। दुष्ट यह दुष्ट स्थान जायेगा तो निश्चय ही शुभ फल करेगा। 'विषस्य विषमौषधम्' की उक्ति यहाँ चरितार्थ होती है। कहा जाता है... यो रहति परित्यजति दुष्टान् राहयति व्याजयति वास राहुः" राहु को स्वर्भानु कहते हैं। स्वर् धातु चुरादिगण उभयपदी स्वरयति ते का अर्थ है दोष निकालना, कलंक लगाना, बुरा भला कहना, निन्दा करना। भा अदादि परस्मै. भाति + नु= भानु । भानु का अर्थ है - प्रकाश, कान्ति, चमक, सूर्य, सौन्दर्य, दिन, राजा, प्रभु शिव स्वर्भानु का अर्थ हुआ जो सूर्य पर कलंक लगाये, उसे, प्रकाश का अपहरण करे, तेज को छीन ले तम का प्रसार करे, निन्दा करे, सगुणों के समूह में दुर्गुण ढूँढ़ने की चेष्टा करे। सूर्य एवं चन्द्रमा को प्रसने वा उनके प्रकाश मण्डल को आच्छादित करने के कारण राहु को स्वर्भानु नाम दिया गया है।राहु को महावमर्दन करते हैं। यह जिस यह के साथ होता है, उसके गुणों को छीन लेता है। इसके सामने सभी ग्रह अशक्त होते हैं। राहु राक्षस है। किन्तु देवता होकर पूज्य है। यह आश्चर्य की बात है। इसमें एक रहस्य है। राहु दान दाता है, हवन कर्ता है। इन दोनों क्रियाओं से इसमें देवत्व आ गया है। रा धातु दाने हु धातु रखने से राहु राहु बना है। जो दान है, हवन करे वह स्वतः देव है। राहु का यह देवत्व शुभ प्रभाव में खिल उठता है। शुक्राचार्य राक्षसों दैत्यों दानवों असुरों के गुरु है। शुक्र की राशि है, वृष एवं तुला वृष में राहु उच्च का माना जाता है। नृप सौम्य राशि है। वृषगत रातु अपेक्षाकृत सौम्य होता है।राहु स्त्रोत के जाप से राहु अन्तर्दशा शांत होती है और मनवांछित परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। जीवन में प्रसन्नता और सफलता मिलती है. दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं. राहु स्त्रोतम का पाठ सांय के समय स्नान करके राहु देव की मूर्ति के सामने बैठकर जपना लाभदायी होता है। उपाय में राहू मंत्र, राहू स्त्रोतम, राहु स्तुति, राहू आरती आदि हैं . ऐसा कहा जाता है कि हनुमान चालीसा और भैरव चालीसा का विधि पूर्वक जाप करके भी राहू को प्रसन्न किया जा सकता है भैरव चालीसा का जाप इसलिए, क्योंकि राहू को भैरव का प्रतिनिधि माना गया है.आपकी कुंडली में यदि राहू अच्छी स्थिति में हो तो यह एकाएक लाभ प्रदान करके भिखारी को भी राजा और यदि कष्टप्रद हो तो राजा से भिखारी बनाने की क्षमता रखता है. आपको यदि राहू के दुष्प्रभावों से बचना है तो उसका अचूक उपाय है अहंकार का त्याग तथा ईश्वर की भक्ति तथा सामान्य आचरण में भ्रम से दूर रहना. आशा करता हूँ कि, अब आप राहू के विषय में इतना जानने के बाद इससे डरेंगे नहीं अपितु सावधान अवश्य रहेंगे. सतर्क रहेंगे धन्यवाद