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(नदी की कोमल कल-कल, दूर पक्षियों की ध्वनि, मंद हवा) हूँ… यहाँ दुनिया साँस छोड़ती है… और मैं भी… verse 1 नदी के किनारे बैठा हूँ, जहाँ ख़ामोशी भी बोलती है, पैरों तले पड़े पत्थर, मेरी तलाश को टटोलती है। हवा धीरे-धीरे चलकर भूली हुई राहत लाती है, हर साँस के साथ, वक़्त की गांठ खुल जाती है। आकाश फैला है धैर्य-सा, नीले सुकून के रंग में, बादल बहते जा रहे हैं, बिना किसी दंभ के ढंग में। आज पहली बार शोर थककर चुप हो गया, इस ठहराव में मुझे डर से आज़ाद कर गया। प्री-कोरस हवा मेरे कंधों से कहती है, कोई अधूरी बात, “तू आज भी खड़ा है, झेलकर हर बरसात।” दिल का बोझ पिघलने लगता है, जब पानी धरती से बातें करता है। नदी के पास, मैंने फिर साँस लेना सीखा, हर लहर ने मुझसे कोई सच कहा। पंछियों के गीतों में वो बात मिली, जो शोर में कहीं खो गई थी। नदी के पास, मैंने बोझ उतार दिए, शंकाओं को बहते पानी में डाल दिए। ना कल की दौड़, ना बीते कल का भार, बस इस पल को थाम लिया… यही है सार। verse 2 सुनहरी धूप पानी पर चुपचाप उतरती है, हज़ारों अनकहे चमत्कार भीतर भरती है। पत्ते फुसफुसाते हैं मौन की ज़ुबान में, जो सुना नहीं जाता, महसूस होता है जान में। नदी कभी नहीं पूछती, अंत कहाँ है, हर मोड़ को अपनाकर भी आगे बढ़ती जाती है। शायद यही ज्ञान मुझे भी दे रही है, “धीरे चल, राह खुद बनती जाएगी।” प्री-कोरस 2 पंछियों का गीत आज़ादी लिखता है, टूटी उड़ानों को भी उड़ना सिखाता है। धड़कन को नया ठहराव मिला, मैं खुद से फिर जुड़-सा गया। मुखड़ा / कोरस (दोहराव) नदी के पास, मैंने फिर साँस लेना सीखा, हर लहर ने मुझसे कोई सच कहा। पंछियों के गीतों में वो बात मिली, जो शोर में कहीं खो गई थी। नदी के पास, मैंने बोझ उतार दिए, शंकाओं को बहते पानी में डाल दिए। ना कल की दौड़, ना बीते कल का भार, बस इस पल को थाम लिया… यही है सार। ब्रिज / भावनात्मक शिखर दिनों के शोर में भटकता रहा, उधार के सपनों में खुद को खोता रहा। घड़ियाँ चिल्लाती रहीं, “पीछे मत रह,” भविष्य का डर मन में करता रहा पहर। पर नदी ने मुझसे कुछ भी नहीं पूछा, ना हार का हिसाब, ना जीत का जूता। बस बहती रही, सीधी और सच-सी, कहती रही, “जैसा है तू, वही काफ़ी है अभी।” (मौन हमिंग, संगीत उभरता है) हूँ… हम्म… / Instrumental (~40 सेकंड) (नदी और हवा की आवाज़ थोड़ी गहरी होती है) / Final Chorus (उत्कर्ष) नदी के पास, मुझे खुद की पहचान मिली, ना डर, ना दाग़, ना योजना संग चली। बस एक आत्मा, जो ठहरना सीख गई, इस धीमे-से दिन की सुंदरता में जी गई। नदी के पास, सुकून धीरे मिला, जैसे हवा और पानी सब पहले से जानते थे क्या। अगर दुनिया भारी लगे, हाथों में थाम, तो थोड़ी देर ठहर जा… जहाँ नदी बहती है शांत। / Outro सूरज झुकता है, आसमान नरम पड़ता है, दिल का सारा बोझ कहीं पीछे छूट जाता है। कल इंतज़ार करेगा, आज मैं यहीं हूँ, पूरा, जाग्रत, शांत… जहाँ नदी मुझे साँस लेना सिखाती है। (नदी और पक्षियों की आवाज़ में फ़ेड आउट)