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जीव चेतना में आदमी की उपयोगिता नहीं है, साधन को ही उपयोगी माना गया है। इसमें संबंध का निर्वाह सुविधा के लिए ही होता है, इसमें इंसान इमोशनली चैलेंज्ड होता ही रहता है। मानव चेतना का प्रस्ताव ठीक से सुन लेने भर से ही हमें ये स्वीकार होने लगता है कि मानव की उपयोगिता “समाधान-समृद्धि”, मानवजाति की उपयोगिता “अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था” है। इसके बाद चीज़ें तो वही की वही रहती हैं, हमारे अंदर उपयोगिता वादी दृष्टिकोण आने से हमारा नज़रिया बदल जाता है… जैसे ये बात समझ में आ जाने भर से ही हमें ये स्पष्ट होने लगता है कि, संबंध का निर्वाह उपयोगिता को समझने-समझाने में ही है, ये समझ में आने के बाद हम इमोशनली चैलेंज्ड नहीं होते हैं। इस प्रकार शरीर की उपयोगिता भी समझने और समझ को प्रमाणित करने के लिए है, ये भी समझ के आता है। और जहां तक सामान की बात आती है, तो उसमें भी हमारे अंदर उपयोगिता वादी दृष्टिकोण रहता है, तो हमें स्पष्ट रहता है कि समस्त सामान शिक्षा के लिए है और शरीर के स्वास्थ्य के लिए है। हम जब समझदारी के साथ उपयोगिता को देख पाते हैं, तभी हम वहन-निर्वहन कर पाते हैं, अर्थात व्यवहार कर पाते हैं। इस तरह व्यवहार पूर्वक सुखी होते हैं, तो हर काम ज़रूरी हो जाता है और कोई भी काम मज़बूरी नहीं रह जाता है। Ask Anything, Anytime on 9968844444 zindagi ke har sawal ka yahan hai jawab 💖