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जय श्री सियाराम।। 🌺 सुंदरकाण्ड दोहा 2🌺 सुरसा नाम अहिन्ह के माता। पठइन्हि आई कही तेहिं बाता॥ देवताओं ने पवनपुत्र हनुमानजी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए (परीक्षा हेतु) उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा। उसने आकर हनुमानजी से यह बात कही— आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कहुँ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमानजी ने कहा— श्रीरामजी का कार्य करके मैं लौट आऊँगा और सीताजी की खबर प्रभु को सुना दूँगा। तब तव बदन पैठिहौं आई। सत्य कहौं मोहि जान दे माई॥ कवनहुँ जतन देह नहिं जाना। प्रसन्न न मोहि कहेउ हनुमाना॥ (सुरसा बोली) तब मैं तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगी। (हनुमानजी बोले) हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दो। जब किसी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमानजी ने कहा— तो फिर मुझे खा लो। जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ उसने एक योजन तक मुँह फैलाया। तब हनुमानजी ने अपने शरीर को उससे दुगुना कर लिया। सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ॥ उसने सोलह योजन का मुँह किया। हनुमानजी तुरंत बत्तीस योजन के हो गए। जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ जैसे-जैसे सुरसा मुँह का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमानजी उससे दुगुना रूप दिखाते थे। उसने सौ योजन का मुँह किया। तब हनुमानजी ने अत्यंत छोटा रूप धारण कर लिया। बदन पैठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिर नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ वे उसके मुँह में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए और सिर नवाकर विदा माँगी। (सुरसा बोली) मुझे देवताओं ने जिस काम से भेजा था, तुम्हारी बुद्धि और बल का भेद मैंने पा लिया। राम काजु सब करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ तुम श्रीरामचंद्रजी का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल और बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गई। तब हनुमानजी हर्षित होकर आगे बढ़े।