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भोले बाबा जी का भजन/ ऐसा जवाईं पसंद नहीं, मान जाओ गौरां — घर-बार नहीं है 🔶 डिस्क्रिप्शन (Description) यह पंक्तियाँ हमारे समाज की उस सोच को दर्शाती हैं जहाँ रिश्तों को धन, घर-बार और हैसियत से तौला जाता है। यह व्यंग्यात्मक लोकभाव एक साधारण लेकिन सच्ची बात कहता है — इंसान का मूल्य उसके मन, संस्कार और व्यवहार से होना चाहिए, न कि केवल संपत्ति से। यह रचना लोकसंस्कृति, घरेलू संवाद और सामाजिक सोच का सजीव चित्रण है। 🔶 टैग / हैशटैग (Tags / Hashtags) #ऐसा_जवाईं_पसंद_नहीं #गौरां_घर_बार_नहीं #लोकभाव #ग्रामीण_संस्कृति #सामाजिक_संदेश #रिश्तों_की_हकीकत #व्यंग्य_पंक्तियाँ 🔶 कीवर्ड (Keywords) ऐसा जवाईं पसंद नहीं गौरां घर बार नहीं है सामाजिक व्यंग्य पंक्तियाँ ग्रामीण लोक संवाद रिश्तों में सोच लोक संस्कृति कविता सच्चाई भरी पंक्तियाँ