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तानपुरा : भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा भारतीय शास्त्रीय संगीत में तानपुरा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे संगीत की “आत्मा” कहा जाता है, क्योंकि इसके बिना राग, स्वर और आलाप की कल्पना अधूरी मानी जाती है। तानपुरा कोई राग या धुन नहीं बजाता, बल्कि यह निरंतर एक स्थिर नाद उत्पन्न करता है, जिसके सहारे गायक या वादक अपने स्वरों को शुद्ध और स्थिर रखता है। यह वाद्य यंत्र सुरों का आधार स्तंभ है। तानपुरा का प्रयोग मुख्यतः गायन, वादन तथा ध्यान (मेडिटेशन) में किया जाता है। इसकी मधुर गूंज वातावरण को शुद्ध करती है और मन को एकाग्र बनाती है। प्राचीन काल से लेकर आज तक तानपुरा भारतीय संगीत परंपरा का अभिन्न अंग बना हुआ है। तानपुरा का इतिहास तानपुरा का इतिहास बहुत प्राचीन है। माना जाता है कि इसका विकास वीणा वर्ग के वाद्यों से हुआ। प्राचीन ग्रंथों जैसे “नाट्यशास्त्र” और “संगीत रत्नाकर” में तंत्री वाद्यों का उल्लेख मिलता है, जिनसे आगे चलकर तानपुरा विकसित हुआ। शब्द “तानपुरा” दो शब्दों से मिलकर बना है — “तान” अर्थात स्वर या सुर, और “पूरा” अर्थात पूर्ण करना। इसका अर्थ हुआ — सुरों को पूर्ण करने वाला वाद्य। यह नाम ही इसके महत्व को दर्शाता है कि यह स्वर व्यवस्था को पूर्ण और स्थिर बनाता है। तानपुरा की बनावट तानपुरा सामान्यतः लकड़ी या कद्दू (तुंबा) से बनाया जाता है। इसके मुख्य भाग होते हैं — तुंबा (गूंज पात्र) – यह गोल आकार का खोखला भाग होता है, जो ध्वनि को गूंज प्रदान करता है। डंडी या गर्दन – लंबा भाग जिस पर तार बंधे होते हैं। तार (Strings) – प्रायः चार या पाँच तार होते हैं। मुँगरी या खूंटी – तारों को कसने के लिए। जावरी – वह हिस्सा जहाँ तार टिके होते हैं और जिससे विशिष्ट झंकार उत्पन्न होती है। तानपुरा में प्रयुक्त तार प्रायः स्टील, तांबे या पीतल के होते हैं। जावरी की घिसाई से इसकी ध्वनि में मधुर कंपन पैदा होता है, जो तानपुरा की पहचान है। तानपुरा के प्रकार तानपुरा मुख्यतः दो प्रकार का होता है — मिरज तानपुरा – यह महाराष्ट्र के मिरज क्षेत्र में बनाया जाता है और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसकी ध्वनि अत्यंत गहरी और मधुर होती है। तंजावुर तानपुरा – दक्षिण भारतीय शैली का तानपुरा, जो कर्नाटक संगीत में अधिक प्रयोग होता है। इसके अलावा आकार के अनुसार — पुरुष तानपुरा (बड़ा आकार, गहरी ध्वनि) महिला तानपुरा (छोटा आकार, तीखी ध्वनि) आजकल इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा भी प्रचलन में है, जो अभ्यास और मंच दोनों के लिए सुविधाजनक माना जाता है। तानपुरा के स्वर संयोजन तानपुरा सामान्यतः राग के आधार स्वर के अनुसार ट्यून किया जाता है। सामान्य संयोजन इस प्रकार होता है — सा – प – सा – सा या सा – म – सा – सा (कुछ रागों में) इन स्वरों के निरंतर कंपन से एक स्थिर ध्वनि क्षेत्र बनता है, जिसे “नाद क्षेत्र” कहा जाता है। इसी आधार पर गायक अपने स्वर साधता है। तानपुरा का संगीत में महत्व तानपुरा बिना किसी ताल या लय के केवल नाद उत्पन्न करता है, पर इसका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। इसके प्रमुख महत्व इस प्रकार हैं — स्वर शुद्धि में सहायता सुर की स्थिरता बनाए रखना राग की भावना को गहराई देना गायक और श्रोता दोनों को एकाग्र करना वातावरण को शांत और पवित्र बनाना कहा जाता है कि तानपुरा “गुरु” के समान है, जो शिष्य को हर क्षण सही सुर का मार्ग दिखाता है। तानपुरा और साधना भारतीय संगीत में अभ्यास को “रियाज़” कहा जाता है। रियाज़ के समय तानपुरा का होना अनिवार्य माना जाता है। इसके साथ किए गए स्वर अभ्यास से — आवाज़ स्थिर होती है स्वर शुद्ध होते हैं सुर पहचानने की क्षमता बढ़ती है मन शांत होता है ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है कई साधक तानपुरा के साथ ध्यान भी करते हैं, क्योंकि इसकी निरंतर गूंज मानसिक तनाव को कम करती है और आत्मिक शांति प्रदान करती है। आधुनिक समय में तानपुरा आज के समय में परंपरागत लकड़ी के तानपुरा के साथ-साथ डिजिटल और मोबाइल एप आधारित तानपुरा भी उपलब्ध हैं। ये अभ्यास के लिए बहुत उपयोगी हैं, परंतु मंच पर आज भी असली तानपुरा का महत्व बना हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा सुविधाजनक जरूर है, पर पारंपरिक तानपुरा की जीवंत ध्वनि और प्राकृतिक कंपन का स्थान कोई यंत्र नहीं ले सकता। निष्कर्ष तानपुरा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की आधारशिला है। इसके बिना स्वर साधना अधूरी मानी जाती है। यह संगीत साधक का सच्चा साथी है, जो बिना थके निरंतर सही मार्ग दिखाता रहता है। तानपुरा हमें सिखाता है कि जीवन में भी एक स्थिर आधार होना आवश्यक है, जिसके सहारे हम अपने सुरों को सही दिशा में साध सकें। यही कारण है कि तानपुरा को संगीत की आत्मा कहा गया है। कोमल ध के अभ्यास के लिए शब्द (स्वर अभ्यास शब्द) आप इन शब्दों को बोलकर अभ्यास कर सकते हैं – सा रे ग म प ध♭ नि सा प म ग रे सा म प ध♭ नि सा सा नि ध♭ प म ग रे सा तानपुरा के साथ धीमे और स्थिर स्वर में कोमल ध को टिकाकर अभ्यास करना बहुत लाभकारी होता है। कोमल ध का भाव गंभीरता करुण रस शांत प्रभाव गहराई और ठहराव यह स्वर सुनने वाले के मन को भीतर तक छूता है और राग में भावनात्मक गहराई लाता है। #KomalDha #TanpuraPractice #SwarAbhyas #IndianClassicalMusic #RiyazTime #NaadSadhna #SangeetAbhyas #SurAurTaal #VocalRiyaz #TanpuraSound