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लोकतंत्र में भावनाओं की राजनीति आज के समय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और परीक्षा-उपयोगी विषय है। UPSC, UPPSC, BPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की मुख्य परीक्षा में इस विषय से जुड़े प्रश्न बार-बार पूछे जा रहे हैं। यह निबंध न केवल राजनीतिक प्रक्रिया को समझने में मदद करता है, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता, जनभागीदारी और नीति-निर्माण पर भावनाओं के प्रभाव को भी स्पष्ट करता है। लोकतंत्र का मूल आधार विवेक, तर्क और जनहित माना जाता है, किंतु व्यवहार में यह देखा जाता है कि राजनीतिक दल और नेता अक्सर तर्क के स्थान पर भावनाओं का सहारा लेते हैं। जाति, धर्म, राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय अस्मिता, भय, आक्रोश और करुणा जैसी भावनाएँ चुनावी राजनीति का प्रमुख हथियार बन चुकी हैं। भावनाओं की राजनीति का उद्देश्य जनता को तात्कालिक रूप से प्रभावित करना होता है, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। भावनाएँ स्वयं में नकारात्मक नहीं होतीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय भावना ने जनता को एकजुट किया और लोकतंत्र की नींव मजबूत की। परंतु जब भावनाओं का प्रयोग विवेक और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध किया जाता है, तब यह लोकतंत्र के लिए चुनौती बन जाता है। आज सोशल मीडिया, 24x7 न्यूज़ चैनल और डिजिटल प्रचार ने भावनात्मक राजनीति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया है। लोकतंत्र में भावनाओं की राजनीति के कई रूप देखने को मिलते हैं। धार्मिक भावनाओं का राजनीतिकरण, जातीय पहचान का उभार, राष्ट्रवाद का अतिशयोक्तिपूर्ण प्रयोग और “हम बनाम वे” की मानसिकता इसका प्रमुख उदाहरण हैं। इससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है और तर्कसंगत संवाद कमजोर पड़ता है। चुनावी विमर्श विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों से हटकर भावनात्मक नारों तक सीमित हो जाता है। इस विषय का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि भावनाओं की राजनीति अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। जब बहुसंख्यक भावनाओं के आधार पर नीति-निर्माण होता है, तब लोकतंत्र की समावेशिता खतरे में पड़ जाती है। संविधान द्वारा प्रदत्त समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्य कमजोर हो सकते हैं। हालाँकि, भावनाओं की राजनीति के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, महिला अधिकार और मानवाधिकार आंदोलनों में करुणा और नैतिक भावनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भावनाएँ विवेक और संवैधानिक मूल्यों के साथ संतुलित होती हैं, तब वे लोकतंत्र को सशक्त भी कर सकती हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय GS Paper 2, निबंध पत्र और राजनीति शास्त्र के वैकल्पिक विषय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तर लेखन में उम्मीदवारों को भावनाओं की राजनीति के कारण, प्रभाव, उदाहरण और समाधान को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना चाहिए। भारतीय संदर्भ के साथ-साथ वैश्विक उदाहरणों का उल्लेख उत्तर को और अधिक प्रभावी बनाता है। समाधान के रूप में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, स्वतंत्र मीडिया, राजनीतिक शिक्षा, नागरिक चेतना और चुनावी सुधारों पर जोर देना आवश्यक है। मतदाताओं में आलोचनात्मक सोच विकसित करना और भावनात्मक अपील के बजाय मुद्दा-आधारित राजनीति को बढ़ावा देना लोकतंत्र को स्वस्थ बना सकता है। GS मंथन की यह कक्षा/वीडियो लोकतंत्र में भावनाओं की राजनीति को सरल भाषा में, परीक्षा-उन्मुख दृष्टिकोण के साथ समझाने का प्रयास है। इसमें परिभाषा, उदाहरण, सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव, संवैधानिक मूल्य, समकालीन संदर्भ और उत्तर लेखन के उपयोगी बिंदु शामिल हैं, जो मुख्य परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करने में सहायक होंगे। यदि आप UPSC, UPPSC, BPSC, RO ARO या अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो यह वीडियो आपके लिए अत्यंत उपयोगी है। वीडियो को अंत तक देखें, नोट्स बनाएं और नियमित उत्तर लेखन अभ्यास करें। चैनल को सब्सक्राइब करें, वीडियो को लाइक करें और इसे अन्य अभ्यर्थियों के साथ साझा करें, ताकि GS मंथन के माध्यम से आपकी तैयारी और अधिक मजबूत हो सके। लोकतंत्र में भावनाओं की राजनीति भावनात्मक राजनीति Democracy and emotions Indian democracy essay राजनीतिक ध्रुवीकरण जाति और धर्म की राजनीति राष्ट्रवाद और राजनीति संवैधानिक मूल्य लोकतंत्र की चुनौतियाँ GS Paper 2 polity UPSC essay topics UPPSC mains essay BPSC essay preparation Political awareness India Media and democracy Social media and politics Electoral politics India Democratic institutions Public opinion and emotions Ethics in politics लोकतंत्र में भावनाओं की राजनीति, democracy emotion politics, UPSC essay hindi, GS मंथन, polity essay UPSC, UPPSC mains essay, BPSC essay topic, indian democracy issues, emotional politics india, democracy challenges, GS paper 2 polity, essay writing UPSC, political awareness, media and democracy, social media politics, mains answer writing