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चल उधर अब जिंदगीकी लाजवाबी की तरफ। लौट आ मत और जा इश्क ए मज़ाजी की तरफ।। प्यार की वो बेकरारी डाक आने पर कि जब। दृग लगे रहते थे तेरे खत जबाबी की तरफ।। एक दिन मुरझायेगा ये धूल में मिल जायेगा। देखता है तू यहां जिस गुल गुलाबी की तरफ।। हां हमें भी नाज है इस कामयाबी पर मगर। ध्यान दे कुछ तो उधर उस कामयाबी की तरफ।। छोड़ कर माता पिता को वो शहर जब से गया। फिर नहीं देखा कभी मां जी पिताजी की तरफ।। सिर चढ़ा तेरे अहम गाफिल नशा सबसे बुरा। देखता है क्या उधर तू उस शराबी की तरफ।। हों हजारों खूबियाँ बे कार हैं सारी 'समर'। उठ गयी उंगली अगर तेरी खराबी की तरफ।। Samar Singh