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सुन्दरकाण्ड का शक्तिशाली प्रसंग – हर समस्या का अचूक समाधान || आज की कथा ||श्री पूज्य राजन जी#katha सनातन धर्म में श्रीरामचरितमानस का हर काण्ड अपने भीतर अद्भुत रहस्य, ऊर्जा और समाधान समेटे हुए है, परन्तु जब बात आती है सुन्दरकाण्ड की, तो यह केवल एक अध्याय नहीं, बल्कि संकट-मोचन, भय-नाशक और मनुष्य के अंतःकरण को दिव्य प्रकाश से भर देने वाला महाग्रंथ का वह अंश है, जहाँ स्वयं हनुमान जी अपने चरित्र के माध्यम से यह प्रमाणित करते हैं कि विश्वास, समर्पण, साहस और प्रभु-नाम – ये चार स्तम्भ यदि जीवन में दृढ़ हो जाएँ, तो कोई भी समस्या मनुष्य को पराजित नहीं कर सकती। सुन्दरकाण्ड की कथा का केंद्र वीर, विनम्र और प्रभु-भक्त हनुमान जी हैं। यह वह काण्ड है जहाँ हनुमान जी की भक्ति अपने उच्चतम शिखर पर दिखाई देती है, और यही कारण है कि भक्त जब भी अपने जीवन में असहाय, निराश या भयभीत अनुभव करता है, तो वह सुन्दरकाण्ड का पाठ या प्रसंग सुनकर अद्भुत मानसिक शांति और समाधान प्राप्त करता है। इस काण्ड में समुद्र-लाँघन, सीता-माता की खोज, रावण की लंका में प्रवेश, अशोक वाटिका में माता से भेंट, रावण से संवाद, लंका-दहन और वापस श्रीराम तक संदेश पहुँचाने की घटनाएँ केवल भौतिक घटनाएँ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संकेत हैं, जो यह बताते हैं कि संकट कितना भी विशाल हो, उसे पार किया जा सकता है, यदि साधन प्रभु-प्रेरित हो और उद्देश्य निष्काम हो। 🌺 समस्या का मूल और समाधान का मार्ग हर समस्या का जन्म बाहर नहीं, मन के भीतर होता है। जब मन शंकित होता है, तो छोटे-से छोटे संकट भी पर्वत जैसे लगते हैं, और जब मन में प्रभु-भक्ति का प्रकाश हो, तो पर्वत-जैसा संकट भी तिनके जैसा हो जाता है। सुन्दरकाण्ड इसी मनोविज्ञान का सबसे जीवंत प्रमाण है। हनुमान जी के सामने समस्या क्या थी? – समुद्र, जिसकी कोई सीमा नहीं। – रावण की लंका, जहाँ प्रवेश असंभव-सा था। – माता सीता की खोज, जिनका कोई सुराग नहीं। – रावण की शक्ति, जो त्रिलोक-विजयी था। परन्तु हनुमान जी ने समस्या को देखा नहीं, समाधान को देखा। उन्होंने अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं किया, उन्होंने भरोसा किया – श्रीराम के नाम पर। तुलसीदास जी लिखते हैं: "राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम" अर्थात, जब उद्देश्य प्रभु का कार्य हो, तो विश्राम नहीं, विराम नहीं, रुकावट नहीं। यही सूत्र जीवन पर लागू होता है। जब आप किसी समस्या से घिरते हैं, तो समाधान पहले से मौजूद होता है, परन्तु आपकी दृष्टि समस्या पर टिक जाती है, समाधान पर नहीं। सुन्दरकाण्ड यह सिखाता है कि दृष्टि बदलिए, संकट का आकार छोटा हो जाएगा। 🚩 समुद्र लाँघने का प्रसंग – आत्मविश्वास का आध्यात्मिक रूप समुद्र पार करना कोई साधारण घटना नहीं। यह संकेत है कि जीवन में जो भी अपरिमित बाधाएँ हैं, वे समुद्र के समान हैं। हनुमान जी को पहले लगा कि यह कार्य असंभव है, तब जामवंत जी ने उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराया। यह प्रसंग बताता है कि जीवन में कई बार हमें अपनी क्षमताओं का स्मरण किसी मार्गदर्शक से प्राप्त होता है। जैसे आपके जीवन में भी – गुरु, संत, माता-पिता या कोई प्रेरणा-स्रोत आपकी छिपी शक्ति का स्मरण करा देता है। परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि शक्ति का स्मरण कराया गया, अहंकार का नहीं। जामवंत जी ने कहा – “तुम यह कार्य कर सकते हो”, परन्तु यह नहीं कहा कि “तुम सबसे शक्तिशाली हो।” हनुमान जी ने शक्ति का प्रयोग किया, परन्तु अहंकार नहीं आने दिया, क्योंकि शक्ति का स्रोत वे स्वयं नहीं मानते, वे मानते हैं – श्रीराम। समुद्र-लाँघन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि: समस्या बड़ी हो सकती है, परन्तु क्षमता उससे बड़ी होती है। क्षमता का प्रयोग तभी फलदायी है, जब उद्देश्य पवित्र हो। पवित्र उद्देश्य का फल प्रभु-कृपा से मिलता है, स्वार्थ से नहीं। 🌿 अशोक वाटिका में माता सीता से भेंट – धैर्य और संवेदना का समाधान आज की दुनिया में समस्या केवल आर्थिक, पारिवारिक या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं – सबसे बड़ी समस्या है भावनात्मक टूटन। जब व्यक्ति भीतर से टूट जाता है, तो बाहर से कोई भी सहायता उसे संतोष नहीं देती। अशोक वाटिका का प्रसंग इसी बात को दर्शाता है। माता सीता चारों ओर से निराश थीं – रावण का दबाव, राम से दूरी, भविष्य की चिंता, और असहायता का भाव। तब हनुमान जी राम-मुद्रिका दिखाते हैं। यह मुद्रिका केवल एक अंगूठी नहीं, यह है – आशा का प्रमाण, विश्वास का स्पर्श, और समाधान का बीज। माता को मुद्रिका मिलते ही विश्वास हुआ कि – “प्रभु ने मुझे भुलाया नहीं है।” जीवन में भी जब आपको यह अनुभव हो कि आप अकेले हैं, तब यदि आपको प्रभु-संकेत, गुरु-वचन या आस्था का कोई प्रमाण मिल जाए, तो समाधान की शुरुआत वहीं से हो जाती है। इस प्रसंग से समाधान की ये कुंजी मिलती हैं: विश्वास दिलाइए, समस्या आधी समाप्त संवेदना रखिए, समाधान प्रभावी धैर्य रखिए, संकट टिक नहीं पाएगा 🔥 लंका-दहन – समस्या का अंत नहीं, समाधान की घोषणा अधिकतर लोग लंका-दहन को क्रोध का प्रतीक समझते हैं, परन्तु यह क्रोध नहीं, यह है अधर्म के विनाश की घोषणा। यह प्रसंग बताता है कि जब समाधान कार्यान्वित होता है, तो उसका प्रभाव दिखाई भी देता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बातें: लंका हनुमान जी ने नहीं जलाई – अधर्म ने स्वयं अपना अंत बुलाया हनुमान जी ने केवल प्रभु-कार्य किया समस्या का विनाश तभी संभव, जब अधर्म का समर्थन बंद हो जाए आज आपके जीवन की “लंका” क्या है? – कर्ज़, क्लेश, भय, बीमारी, रिश्तों का तनाव, मानसिक अशांति, असफलता, आत्म-संदेह, नकारात्मकता, बुरी संगत, बुरी आदत, भाग्य का अवरोध, या बार-बार आने वाले संकट। और “दहन” क्या है? – समस्या का अंत, जो होता है: प्रभु-नाम से साहस से निर्णय से सत्य के पक्ष में खड़े होने से अधर्म और नकारात्मकता को छोड़ देने से