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1- रफ़ाक़तों में पशेमानियाँ तो होती हैं कि दोस्तों से भी नादानियाँ तो होती हैं बस इस सबब से कि तुझ पर बहुत भरोसा था गिले न हों भी तो हैरानियाँ तो होती हैं उदासियों का सबब क्या कहें ब-जुज़ इस के ये ज़िंदगी है परेशानियाँ तो होती हैं 'फ़राज़' भूल चुका है तेरे फ़िराक़ के दुख कि शा'इरों में तन-आसानियाँ तो होती हैं .. .. .. 2- ज़रा सी गर्द-ए-हवस दिल पे लाज़मी है 'फ़राज़' वो इश्क़ क्या है जो दामन को पाक चाहता है .. .. .. 3- यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिए अब यही तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहाने माँगे अपना ये हाल कि जी हार चुके लुट भी चुके और मोहब्बत वही अंदाज़ पुराने माँगे दिल किसी हाल पे क़ाने ही नहीं जान-ए-'फ़राज़' मिल गए तुम भी तो क्या और न जाने माँगे .. .. .. 4- तुझे है मश्क़-ए-सितम का मलाल वैसे ही हमारी जान थी जाँ पर वबाल वैसे ही चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का 'फ़राज़' उस ने भी पूछा था हाल वैसे ही