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बीज डाले। ज़िंदगी वही पुरानी लय में चल रही थी। उसे क्या पता था — उसी समय शहर में उसके नाम पर काग़ज़ बन रहे थे।शहर के एक छोटे से दफ़्तर में शिवप्रसाद बैठा था। सामने उसका वकील — पवन त्रिपाठी। टेबल पर रामधन के आधार की कॉपी, खतौनी, राशन कार्ड। पवन बोला— “सर, नाम ट्रांसफर कराने के लिए एग्रीमेंट टू सेल बना देते हैं। फिर पॉवर ऑफ अटॉर्नी।” शिवप्रसाद ने सिगरेट जलाते हुए कहा— “बस जल्दी करो। किसान अनपढ़ है। कोर्ट जाएगा भी तो सालों घूमेगा।” पवन हँसा। “फिकर मत कीजिए… हमारे आदमी तहसील में बैठे हैं।” दो घंटे में नकली हस्ताक्षर तैयार हो गए। रामधन के नाम से ज़मीन बेचने का एग्रीमेंट। उसने कभी देखा भी नहीं था वो काग़ज़। लेकिन अब सरकारी रिकॉर्ड में ज़मीन शिवप्रसाद की हो चुकी थी।तीन हफ्ते बाद। रामधन खेत में निराई कर रहा था। तभी एक ट्रैक्टर आया। पीछे दो आदमी। एक बोला— “अबे हटो यहाँ से। ये ज़मीन अब मिश्रा जी की है।” रामधन हँस पड़ा। “कौन मिश्रा?” दूसरा बोला— “शिवप्रसाद मिश्रा। काग़ज़ हमारे पास हैं।” रामधन का चेहरा सख़्त हो गया। “ये मेरी ज़मीन है।” उन्होंने जेब से काग़ज़ निकाले। रजिस्ट्री की कॉपी। रामधन पढ़ नहीं सकता था। बस ऊपर अपना नाम देखा। नीचे अंगूठे का निशान। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “ये… ये कब हुआ?” ट्रैक्टर वाला बोला— “तीन हफ्ते पहले।” #emotionalstory #inspirationalstory #hearttouchingstory #moralstories #moralstory #motivationalstory #bedtimestories #hindistories #kahani #kahaniya #lovestory #sachikahani #truestory #crimestory