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शीर्षक विचार: * मानव विधाता: एक नूतन दर्शन | The Divine Essence Within ईश्वर अंश समाया है: प्रकृति और पुरुष का द्वंद्व अस्तित्व की खोज: एक आध्यात्मिक काव्य यात्रा विवरण (Description): "यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक?" प्रस्तुत कविता मनुष्य के अहंकार, उसके अल्पज्ञान और ब्रह्मांड की उस 'महाज्योति' के बीच के संबंध को टटोलती है। क्या हम वास्तव में इस सृष्टि के संचालक हैं, या हम प्रकृति की गोद में केवल एक 'तृण' मात्र हैं? इस काव्य पाठ (Spoken Word) के माध्यम से हम सत्य की खोज के उस पथ पर निकलेंगे जहाँ विज्ञान और आध्यात्म का मिलन होता है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जब तक मनुष्य के भीतर दया, करुणा और प्रेम शेष है, तब तक वह उस परमब्रह्म का साक्षात् अंश है। कविता के मुख्य अंश: प्रकृति और मानव का अटूट संबंध। अस्तित्व की खोज और सत्य का मार्ग। विज्ञान और ज्ञान का असली स्रोत। मानवता ही असली ईश्वरत्व है। लेखन: [ Prabhat] संगीत: [ Prabhat/Suno AI paid subscription] #️⃣ Hashtags #SpiritualPoetry #SpokenWord #HindiKavita #Adhyatma #SelfRealization #Philosophy #DivineEssence #Humanity #NatureVsMan Niche Hashtags: #IshwarAnsh #GeetaGyan #InternalPeace #TruthSeeker #SoulSearch #VedicWisdom #HindiLiterature #MotivationalPoetry #Existenc (आरंभ: दार्शनिक प्रश्न) यह धरा मौन उपवास करेगी कब तक? तुझ पर मानव विश्वास करेगी कब तक? तू अल्पज्ञान, यह ज्ञान स्रोत; तू दीपक ज्योति, यह महाज्योति। यह निर्मल है तो कटु परिधान, यह मौन रहे तो तू करे व्याख्यान। (मध्य: शक्ति और प्रकृति का द्वंद्व) सृष्टि का पालक तो तू है, इसका संहारक भी तू है, तू प्रभावमान, तू शक्तिमान, पर नहीं संबंध इतना सा। सृष्टि भी तेरी पालक है, यदि तू संहारक है इसका, तो यह भी तेरी संहारक है! (चिंतन: अस्तित्व की खोज) युग-युग की महिमा का ज्ञान करना भी नहीं इतना आसान, सत्य की खोज का पथिक हूं मैं, निरंतर सत्य की खोज में निकलता हूं मैं। कैसे खोजूं? कैसे जानूं? शाश्वत सत्य है क्या? इस महान प्रकृति की गोद में मेरा अस्तित्व है क्या? एक तृण मात्र अस्तित्व मेरा, प्रभु चरणों में नित्य वास मेरा, फिर क्या जाना और क्यों आना, जब उद्गम स्रोत ही है वह मेरा? मैं खुद को सर्वशक्ति समझता हूं, यह भ्रम मात्र ही है मेरा, ब्रह्म में निवास है मेरा, जगपति के चरणों से मेरा उद्गम। (चरम: विज्ञान और आध्यात्म का मिलन) मैं कब पृथक हूं उससे? वह महाज्योत है और मैं हूं ज्योत, पर कुछ तो निश्चित मुझमें है उसका। विज्ञान भले ही बिसरा दे उसको, यह ज्ञान-विज्ञान सब है उसका, सब ज्ञानों का वही स्रोत है, वही सब नाच नचाता है, वही करण, वही करता है, वह हर क्षण रूप बदलता है। (निष्कर्ष: नूतन दर्शन और मानवता) मैं मनुष्य को ईश्वर बोल पाया, मैं शब्द अपने तोल पाया, क्या अब भी भ्रमित हूं? अपने शब्दों से क्या भेद पाया? निसंदेह तर्क विचित्र सा है, अहंकार में मानव दानव है, फिर क्यों ईश्वर मैं बोलता हूं? एक नूतन दर्शन गूंथता हूं। परमब्रह्म की ही छाया में, परमब्रह्म को ही ढूंढता हूं, पूर्ण माया के साथ मनुज काया में, ईश्वर अंश समाया है। जब तक दया-करुणा प्रेम भाव में बहती है, तब तक मनुजता से उसका नाता है, और जब तक मनुज में मनुजता है, वह इस जगत का शाश्वत विधाता है। जो विकारों के वशीभूत है वह दानव है, जो विकारों से रहित है वह मानव है। सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च है प्रकृति, जिसकी मात्र मानव है एक कृति।