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15 अगस्त : 15 कहानियां ये कहानी है साल 1938 की. अंग्रेजों ने अब तक भारत के अनेक क्रांतिकारियों की वीरता देखी थी. अब बारी थी मात्र 12 साल के एक क्रांतिकारी की बग़ावत देखने की. ये महान क्रांतिकारी थे उड़ीसा के बाजी राउत. घटना 10 अक्टूबर 1938 की है. फिरंगी पुलिस ने भुवनेश्वर इलाके के कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया और थाने ले आई. हिरासत में लिए गए कैदियों की रिहाई की मांग ज़ोर पकड़ने लगी. इलाके के लोगों ने पुलिस के इस अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. इसपर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दी. जिसमें दो लोगों की मौत हो गई. फिर क्या था...लोगों का आक्रोश अपनी अंतिम सीमा को पार कर गया. अब जान बचाने के लिए अंग्रेजी पुलिस के सामने वहाँ से भागने के सिवा और कोई चारा न था. पुलिस ने ब्राह्मणी नदी के नीलकंठ घाट होते हुए ढेंकनाल जिले की ओर भागने की कोशिश की. और 11 अक्टूबर को बारिश में भीगते हुए नदी किनारे पहुंचे. जहाँ नदी के तट पर एक बालक अपनी नाव के साथ था. ये थे बाजी राउत. अपनी जान बचाने की फ़िराक ने पुलिस वालों ने बाजी राउत को नदी पार कराने का हुक्म दिया. मगर बाजी राउत अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार से अनजान नहीं थे. बल्कि अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ उनके दिल में क्रोध और आक्रोश कूट-कूट कर भरा था. उन्होंने अंग्रेजी पुलिस को नदी पार कराने से साफ मना कर दिया. तो सैनिकों ने बन्दूक की बट से बाजी राउत के सिर पर वार किया. बाजी ज़मीन पर गिर पड़े मगर अपनी बात पर अड़े रहे. इसपर गुस्साए अंग्रेजी सैनिकों ने बाजी राउत को गोलियों से भून डाला. इस दौरान बाजी राउत के कुछ साथी भी मारे गए. इन बच्चों की शहादत ने लोगों को झकझोर कर रख डाला. आंदोलनकारी और भी आक्रोशित हो उठे. इतिहास के पन्नों में बाजी राउत भले ही कहीं खो कर रह गये हों मगर जब जब आज़ादी की लड़ाई की बात चलती है तो इतिहास के वही पन्ने बाजी राउत को देश का सबसे कम उम्र का शहीद बताते हैं. Website: https://www.dalmiacement.com/ Like Us: @facebook : / mydalmiacement Follow Us: @twitter : / mydalmiacement