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प्रेम में दुख क्यों है ? कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर है, क्योंकि प्रेम तो आनंद है, उत्सव है, उत्साह है। अगर प्रेम में दुख है, तो समझ लेना कि यह प्रेम नहीं, कोई दूसरा ही व्यापार चल रहा है—स्वामित्व का, अपेक्षाओं का, नियंत्रण का। तुम जिसे प्रेम कहते हो, उसमें शायद तुमने किसी से कोई उम्मीद बाँध रखी है—कि वह तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार चले, तुम्हें खुशी दे, तुम्हें समझे। लेकिन प्रेम मांगने की चीज़ नहीं है, यह देने की कला है। जब प्रेम माँग बन जाता है, तो वह दर्द दे जाता है। समस्या यह है कि लोग प्रेम करना नहीं जानते, वे बस किसी को पकड़कर उससे सुख निचोड़ना चाहते हैं। लेकिन प्रेम कोई संतरे का रस नहीं है कि तुमने निचोड़ा और मीठा स्वाद आ गया। प्रेम तो एक गहरा बहाव है—स्वतंत्रता का, स्वीकार का, समर्पण का। अगर प्रेम में दुख है, तो दो में से एक चीज़ हो रही है: 1. या तो तुम प्रेम नहीं कर रहे, बल्कि किसी से सिर्फ आसक्ति लगाए बैठे हो। 2. या फिर तुम्हारा प्रेम इतना कच्चा है कि उसे अपने स्वार्थों के कारण पीड़ा में बदल दिया है। सच्चा प्रेम तो आनंदित करता है, तुम्हें खुला छोड़ देता है। उसमें बंधन नहीं होता, उसमें अपेक्षाएँ नहीं होतीं। हाँ, कभी-कभी पीड़ा भी होती है, लेकिन वह भी मधुर होती है, कोई कांटा नहीं चुभता, बल्कि वह पीड़ा भी एक कविता बन जाती है। तो अगली बार जब प्रेम में दुख हो, तो खुद से पूछो—क्या यह सच में प्रेम है या कोई सौदा? Osho on love Osho on marriage Osho on depression Osho on meditation