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मंत्र तंत्र यंत्र चॅनल मे आप सभी का स्वागत है सनातन धर्म की उस अद्भुत परंपरा में, जहाँ शब्द ब्रह्म हैं और मंत्र साक्षात् शक्ति... वहाँ एक ऐसा स्तोत्र विद्यमान है जिसे सुनकर ही काल थर्रा उठता है। यह है श्री विचित्र वीर हनुमत स्तोत्र। विचित्र वीर... अर्थात् वह वीर जिसका कोई सानी नहीं। वह रुद्र-रूप हनुमान, जो एक हाथ में वैरियों को उठाए हुए हैं, दूसरे हाथ में पर्वत धारण किए हुए हैं, जिनके कुण्डल ज्वालाओं की तरह दमक रहे हैं, और जिनका वर्ण प्रलय के अग्नि के समान उग्र और तेजस्वी है। यह वही हनुमान हैं जिन्होंने लंका के प्रासाद को भस्म कर दिया था। यह वही हनुमान हैं जो अञ्जनी माता के गर्भ से प्रकट हुए, और जिनका वज्र-देह प्रलयकाल की अग्नि की प्रभा से प्रज्वलित रहता है। इस स्तोत्र में जो शक्ति है, वह केवल शत्रु-नाश की नहीं... यह स्तोत्र दैत्यों को, दानवों को, यक्षों को, राक्षसों को, समस्त ग्रह-बाधाओं को, भूत-प्रेत-पिशाच से लेकर ब्रह्मराक्षस तक सभी को बंधन में डाल देता है। जो साधक इस महास्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, हनुमान जी स्वयं उसके हृदय में प्रवेश करते हैं। सत्य प्रकट होता है। शत्रु की शक्ति चूर्ण हो जाती है। राज-सभा में शत्रु निष्प्रभ हो जाते हैं। जो इस स्तोत्र की शरण लेता है, उसके सामने कोई शत्रु टिक नहीं सकता, कोई बाधा रुक नहीं सकती, कोई नकारात्मक शक्ति ठहर नहीं सकती। अब इस महाशक्तिशाली स्तोत्र को पूर्ण श्रद्धा और एकाग्र चित्त से प्रतिदिन सुनिए। हनुमान जी की कृपा आप पर सदा बनी रहे। मै यह मंत्र आप सभी के लिए जाप करके दे रहा हु कृपया ऐसे प्रति दिन सुने और लाभले चॅनल को शेअर करे सबस्क्राईब करे इसी गुरुदक्षिणा की हम आपसे आशा करते है धन्यवाद 🌹*श्री विचित्र वीर हनुमत स्तोत्र*🌹 “ॐ नमो भगवते, विचित्र-वीर-हनुमते, प्रलय-कालानल-प्रभा-ज्वलत्-प्रताप-वज्र-देहाय, अञ्जनी-गर्भ-सम्भूताय, प्रकट-विक्रम-वीर-दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-ग्रह-बन्धनाय, भूत-ग्रह, प्रेत-ग्रह, पिशाच-ग्रह, शाकिनी-ग्रह, डाकिनी-ग्रह ,काकिनी-ग्रह ,कामिनी-ग्रह ,ब्रह्म-ग्रह, ब्रह्मराक्षस-ग्रह, चोर-ग्रह बन्धनाय, एहि एहि, आगच्छागच्छ, आवेशयावेशय, मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय, स्फुट स्फुट, प्रस्फुट प्रस्फुट, सत्यं कथय कथय, व्याघ्र-मुखं बन्धय बन्धय, सर्प-मुखं बन्धय बन्धय, राज-मुखं बन्धय बन्धय, सभा-मुखं बन्धय बन्धय, शत्रु-मुखं बन्धय बन्धय, सर्व-मुखं बन्धय बन्धय, लंका-प्रासाद-भञ्जक। सर्व-जनं मे वशमानय, श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सर्वानाकर्षयाकर्षय, शत्रून् मर्दय मर्दय, मारय मारय, चूर्णय चूर्णय, खे खे श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया मम कार्य-सिद्धिं कुरु कुरु, मम शत्रून् भस्मी कुरु कुरु स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट् श्रीविचित्र-वीर-हनुमते। मम सर्व-शत्रून् भस्मी-कुरु कुरु, हन हन, हुं फट् स्वाहा।।”