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ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/१/९ 6 дней назад

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ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/१/९
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ब्रह्मसूत्राणुभाष्य-३/१/९

_ पूर्व प्रसंग और वृष्टि भाव: वक्ता बतलाते हैं कि तृतीय अध्याय के प्रथम पाद के द्वितीय अधिकरण में महाप्रभु जी पंचाग्नि विद्या पर विचार कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि जब जीवात्मा द्वितीय आहुति के बाद 'वृष्टि भाव' प्राप्त करता है, तो क्या उसके सभी कर्म नष्ट हो चुके हैं और वह ज्ञान के लिए पूर्ण रूप से अधिकारी बन गया है? महाप्रभु जी का स्पष्ट निर्णय है कि यदि जीवात्मा मुक्त नहीं हुई है और उसे नया देह मिल रहा है, तो इसका अर्थ ही यह है कि अभी उसके कर्म बंधन (अनुशय) शेष हैं और फल भोगना बाकी है। नौवें सूत्र की व्याख्या: * पूर्वपक्ष का मत: पूर्वपक्षी यह तर्क रखता है कि इस जन्म में जो उत्तम योनि (शरीर) मिलती है, वह पूर्व जन्म के उत्तम आचरण के कारण मिलती है। इसलिए आगे के जन्म के लिए 'कर्मशेष' (अनुशय) को मानना आवश्यक नहीं है। महाप्रभु जी का उत्तर (कार्ष्णाजिनि मत): वक्ता समझाते हैं कि महाप्रभु जी के अनुसार श्रुति में प्रयुक्त 'योनि' शब्द केवल उपलक्षण मात्र है। श्रुति केवल यह बताती है कि पूर्व जन्म में अच्छा आचरण किया है, लेकिन यह इस बात की गारंटी नहीं है कि इस जन्म में भी व्यक्ति अच्छे ही कर्म करेगा। यदि ऐसा होता, तो उत्तम ब्राह्मण शरीर प्राप्त करने वाला व्यक्ति कभी शास्त्र निषिद्ध (पाप) कर्म नहीं करता। इसलिए, महाप्रभु जी 'कार्ष्णाजिनि' ऋषि का मत उद्धृत करते हुए कहते हैं कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी 'अनुशय' (पूर्व जन्म के कर्मों के संस्कार) की अपेक्षा होती है। कर्मानुशय के बिना इंद्रियों के संस्कार नहीं होते और उत्तम कर्मों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। श्रुति का प्रकरण और पुरुष भाव: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पंचाग्नि विद्या में प्रकार भेद हैं। प्रत्येक श्रुति अपने-अपने प्रकरण में ही नियामक होती है, एक प्रकरण की श्रुति को दूसरे प्रकरण का निर्णय करने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। पंचाग्नि विद्या में जीवात्मा अपनी अधूरी साधना पूरी करने के लिए 'पुरुष भाव' ही प्राप्त करता है। प्रश्नोत्तरी (पुरुष भाव का अर्थ): प्रश्न: 'पुरुष भाव' का अर्थ पुरुष देह है या केवल मानव देह? उत्तर: इसका अर्थ मनुष्य योनि में 'पुरुष शरीर' से है, क्योंकि इसके बिना उसकी साधना (पंचाग्नि विद्या) आगे कंटिन्यू नहीं हो सकती। * कर्मानुशय की अनिवार्यता: महाप्रभु जी का मानना है कि वैदिक कर्मों के संस्कार (अनुशय) हमारी इंद्रियों और पंचमहाभूतों में बने रहते हैं। यदि हम 'कर्मानुशय' नहीं मानेंगे, तो यह स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि उत्तम ब्राह्मण योनि में जन्म लेने के बाद भी कोई अजामिल की तरह पाप कर्म क्यों करने लगता है। इसलिए नया शरीर प्राप्त होने का अर्थ ही है कि कर्मशेष (अनुशय) विद्यमान है। दसवें सूत्र की व्याख्या: पूर्वपक्ष की शंका: यदि श्रुति केवल उपलक्षण है, तो क्या वह निरर्थक (बेकार) है? पूर्वपक्षी तर्क देता है कि निष्काम कर्म करने वाले को स्वतः ही ज्ञानोपयोगी शरीर प्राप्त हो जाएगा, फिर कर्म शेष (अनुशय) मानने की क्या आवश्यकता है? महाप्रभु जी का समाधान: वक्ता समझाते हैं कि यह श्रुति निरर्थक नहीं है क्योंकि 'धूमादि मार्ग' (सकाम कर्म करने वालों की गति) में इसकी अपेक्षा होती है। सकाम कर्म करने वालों को फल भोगने के बाद जब नया जन्म मिलता है, तो उन्हें पाप के कारण अशुभ शरीर नहीं मिलता, बल्कि उनके उत्तम कर्मानुसार अच्छा शरीर ही प्राप्त होता है। आकस्मिक जन्म का निषेध: वक्ता कहते हैं कि यदि हम अनुशय नहीं मानेंगे, तो उत्तम शरीर की प्राप्ति को 'आकस्मिक' (बिना कारण के अचानक) मानना पड़ेगा। परंतु वैदिक सिद्धांत में जन्म आकस्मिक नहीं होता, यह सकारण (स्वयं के कर्मों के अनुसार) होता है। अलग-अलग श्रुतियाँ अलग-अलग कर्मकर्ताओं (सकाम और निष्काम) के लिए भिन्न-भिन्न फल विधान बताती हैं। [45:00 - 52:24 (अंत तक)] श्रुतियों का समन्वयन: वक्ता बताते हैं कि श्रुति-स्मृति में कर्मकर्ता के भेद से फल का भेद बताया गया है। सकाम और निष्काम कर्मों की श्रुतियों को एक-दूसरे में मिलाने से अव्यवस्था (उपरोध) होगी। अनुशय के बिना शरीर असंभव: बिना अनुशय के फल भोग और जन्म संभव नहीं है। उच्च जाति (ब्राह्मण आदि) में जन्म लेने के बाद भी कुछ लोग कुत्तों या चांडालों की तरह निषिद्ध कर्म (मांस भक्षण आदि) करते हैं। यह सिद्ध करता है कि केवल उत्तम योनि मिलना ही पर्याप्त नहीं है, पूर्व जन्म के अनुशय (संस्कार) व्यक्ति के वर्तमान कर्मों को प्रभावित करते हैं। इसलिए, वृष्टि भाव 'अनुशय युक्त' ही होता है—यही महाप्रभु जी का निश्चित मत और सिद्धांत है। प्रश्नोत्तरी (निष्काम कर्म और अनुशय): प्रश्न: पूर्वपक्ष द्वारा 'कर्म के तारतम्य अनुसार फल विधान' का क्या अर्थ है? उत्तर: पूर्वपक्षी का तर्क है कि सकाम और निष्काम दोनों सदाचरण करते हैं, लेकिन उनके फल अलग होते हैं। पूर्वपक्षी मानता है कि निष्काम कर्म करने वाले को निश्चित ही ज्ञानोपयोगी शरीर मिलेगा और उसके कर्म शेष नहीं बचेंगे। प्रश्न: इस पर महाप्रभु जी का सिद्धांत क्या है? उत्तर: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि महाप्रभु जी के अनुसार निष्काम कर्म करने वाले के भी कर्म शेष (अनुशय) होते हैं। यदि कोई कर्म शेष न बचता, तो जीव को सीधे मोक्ष मिल जाता। शरीर की प्राप्ति होने का सीधा अर्थ ही यह है कि अभी अनुशय बचा हुआ है। 00:00 पूर्व प्रसंग, वृष्टि भाव और नौवें सूत्र (कार्ष्णाजिनि मत) की व्याख्या 15:00 पंचाग्नि विद्या का प्रकरण, 'पुरुष भाव' और कर्मानुशय की अनिवार्यता 30:00 दसवें सूत्र की व्याख्या: पूर्वपक्ष की शंका और महाप्रभु जी का समाधान 45:00 श्रुतियों का समन्वयन, अनुशय का सिद्धांत और अंतिम प्रश्नोत्तरी

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