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Shiv Rachit Shri Ram Stuti | Powerful Ram Bhajan for Peace, Strength & Blessings | Anant bhajan Listen to the divine Shiv Rachit Shri Ram Stuti, a powerful and sacred Ram Stuti composed by Lord Shiva in praise of Shri Ram. This devotional Ram Bhajan fills the heart with peace, strength, faith and deep bhakti. Listening to this Shiv Rachit Ram Stuti helps calm the mind, remove negativity and invite divine blessings. The spiritual vibrations of this Shri Ram Stuti awaken devotion and inner courage. Chanting or listening daily to this Ram Bhajan brings protection, positivity and spiritual balance. The glory of Shri Ram combined with the divine energy of Lord Shiva makes this Shiv Rachit Ram Stuti especially powerful for peace, strength and grace. Make this Shiv Rachit Shri Ram Stuti part of your daily prayer, meditation or Ram bhakti routine and experience divine peace and blessings. 🚩 Jai Shri Ram 🚩 Lyrics: जय राम रमारमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ।। अवधेश सुरेश रमेश बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ।। रजनीचर बृंद पतंग रहे ।सर पावक तेज प्रचंड दहे महि मंडल मंडन चारु तरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ।। मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे बहुरोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ।। भव सिँधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते अति दीन मलीन दुखी नितही । जिन्हके पद पंकज प्रीति नहीँ ।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह केँ । प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके नही राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह के सम वैभव वा बिपदा ।। एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ।। सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ।। तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीनजनं जय राम रमारमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ।। अवधेश सुरेश रमेश बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ।। रजनीचर बृंद पतंग रहे ।सर पावक तेज प्रचंड दहे महि मंडल मंडन चारु तरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ।। मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे बहुरोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ।। भव सिँधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते अति दीन मलीन दुखी नितही । जिन्हके पद पंकज प्रीति नहीँ ।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह केँ । प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके नही राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह के सम वैभव वा बिपदा ।। एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ।। सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ।। तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीनजनं जय राम रमारमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ।। अवधेश सुरेश रमेश बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ।। रजनीचर बृंद पतंग रहे ।सर पावक तेज प्रचंड दहे महि मंडल मंडन चारु तरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ।। मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे बहुरोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ।। भव सिँधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते अति दीन मलीन दुखी नितही । जिन्हके पद पंकज प्रीति नहीँ ।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह केँ । प्रिय संत अनंत सदा तिन्हके नही राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह के सम वैभव वा बिपदा ।। एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ।। सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ।। तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीनजनं