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श्रीकृष्ण ने जीवन को 'लीला' (खेल) कहा है, और इसके पीछे का दर्शन अत्यंत गहरा और मनोवैज्ञानिक है। भगवद्गीता और उनके संपूर्ण जीवन चरित्र को देखें, तो 'जीवन एक खेल है' कहने के पीछे मुख्य रूप से ये 5 कारण समझ आते हैं: 1. आसक्ति से मुक्ति (Detachment) एक खिलाड़ी मैदान में पूरी जी-जान से खेलता है, लेकिन वह जानता है कि खेल खत्म होने के बाद वह मैदान उसका घर नहीं है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जीवन में अपनी भूमिका (Role) पूरी शिद्दत से निभाओ, लेकिन परिणामों और वस्तुओं से इतना मोह न पालो कि उनके खोने पर तुम टूट जाओ। मंत्र: खेल का आनंद लें, लेकिन उसमें उलझें नहीं। 2. हार और जीत की समानता खेल में हार और जीत दोनों ही प्रक्रिया का हिस्सा हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं— 'सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा' (सिद्धि और असिद्धि में समान रहो)। यदि आप जीवन को एक गंभीर युद्ध या बोझ मानेंगे, तो हार आपको अवसाद (Depression) देगी। लेकिन यदि इसे खेल मानेंगे, तो हार केवल एक 'सीख' बनकर रह जाएगी। 3. वर्तमान में जीना (Mindfulness) खेल हमेशा 'अभी' (Present moment) में खेला जाता है। खिलाड़ी बीते हुए गोल या आने वाले परिणाम के बारे में सोचकर नहीं, बल्कि वर्तमान गेंद पर ध्यान केंद्रित करके जीतता है। श्रीकृष्ण का 'निष्काम कर्म' यही है— फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्म के खेल में डूब जाना। 4. भारीपन को दूर करना (Lightness of Being) जीवन की समस्याओं को जब हम 'गंभीर' (Serious) मान लेते हैं, तो तनाव पैदा होता है। खेल शब्द में एक 'उत्सव' और 'हल्कापन' है। श्रीकृष्ण स्वयं युद्ध के मैदान में भी मुस्कुराते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि यह सब काल के प्रवाह में एक दृश्य मात्र है। सीख: चुनौतियाँ आएंगी, पर उन्हें बोझ मानकर नहीं, बल्कि एक 'चैलेंज' की तरह स्वीकार करें। 5. कर्तापन का अहंकार मिटाना जब हम सोचते हैं "मैंने यह किया", तो अहंकार आता है। लेकिन एक बड़े खेल (लीला) में हम सब केवल पात्र (Characters) हैं। सूत्रधार कोई और है। जब हम खुद को ईश्वर की लीला का एक हिस्सा मान लेते हैं, तो सफलता का अहंकार और असफलता का डर दोनों मिट जाते हैं। श्रीकृष्ण के 'जीवन-खेल' के 3 नियम: नियम अर्थ नियम 1 अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करो (कर्म)। नियम 2 परिणाम को खिलाड़ी की तरह स्वीकार करो (समत्व)। नियम 3 चेहरे पर मुस्कान बनाए रखो (प्रसन्नता)। सार: श्रीकृष्ण का संदेश है कि जीवन को इतना गंभीर मत बनाओ कि तुम मुस्कुराना भूल जाओ। अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाओ, पर एक छोटे बच्चे की तरह, जो मिट्टी का घर टूटने पर रोता नहीं, बल्कि दूसरा बनाने में जुट जाता है।