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बोस Vs गांधी त्रिपुरी संकट INC का त्रिपुरी अधिवेशन Study Block Tripuri Session 1939 Haripura Session #tripurisession #haripurasession #mahatmagandhi #netaji #netajisubhashchandrabose #subhashchandre #bose आज हम बात करेंगे उन शख्स की जिनका हमारे देश की आजादी में सर्वाधिक निर्णायक भूमिका रही। नेताजी सुभाष चंद्र बोस। नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने समय के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी शख्सियत और काम कुछ ऐसा था की उनका व्यक्तित्व महात्मा गांधी से भी ऊंचा हो चुका था। आज भले ही हमारे देश के नोटों पर है गांधी जी है पर सब के दिलों में नेताजी ही रहते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि वह व्यक्ति जिसने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया और तन मन धन से केवल देश की आजादी के लिए समर्पित थे, उनको शायद वह दर्जा नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। आप शायद सोच रहे होंगे कि मैंने गलत कहा है, सुभाष बाबू का व्यक्तित्व महात्मा गांधी से ऊंचा कैसे हो सकता है । हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते हैं । पर क्या आप जानते हैं कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता पहली बार सुभाष बाबू ने ही कहा था। एग्जांपल के थ्रू समझ गए कि आखिर कैसे गांधी जी से भी ज्यादा ऊंचा था सुभाष बाबू का। आजादी से पहले तक कांग्रेस की हर वर्ष अधिवेशन हुआ करती थी । 1938 के कांग्रेश के हरिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष बाबू ने की। 1939 में कांग्रेस का अधिवेशन वर्तमान जबलपुर के पास त्रिपुरी में होना था। उस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए सुभाष बाबू ने अपना नाम दिया। पर गांधीजी नहीं चाहते थे की उस अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष बाबू करें। गांधीजी के लाख कहने पर कोई भी बड़ा से बड़ा कांग्रेस का नेता सुभाष बाबू के सामने खड़ा नहीं होना चाहता था । यहां तक कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और अबुल कलाम आजाद ने भी अपना नाम अध्यक्ष पद के लिए वापस ले लिया था । गांधीजी ने राजेंद्र प्रसाद जी को भी अध्यक्ष पद के लिए अपना नाम देने को कहा लेकिन राजेंद्र प्रसाद जी ने भी सुभाष बाबू के सामने खड़े होने से मना कर दिया। इसके बाद महात्मा गांधी ने पट्टाबी सीतारामय्या को अध्यक्ष पद के लिए खड़े होने को मना लिया। गांधी जी ने यहां तक कह दिया कि पट्टाबी की हार मेरी हार होगी। आप यह समझिए कि यह स्टेटमेंट साधारण स्टेट में नहीं थी । यह स्टेटमेंट वह व्यक्ति दे रहे हैं जिनकी बात कांग्रेश सहित पूरी दुनिया मानती थी। लेकिन सुभाष बाबू की शख्सियत अंग्रेज सहित देश के 1जेड 1 लोगों में व्याप्त थी । कांग्रेस के 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए नेताजी सुभाष चंद्र बोस। नेताजी सुभाष चंद्र बोस समझ गए थे उनके और गांधीजी के बीच मतभेद कुछ ज्यादा बढ़ रहे हैं । सुभाष बाबू ने कांग्रेस के पद से रिजाइन कर दिया और उसी वर्ष गांधी जी ने भी कांग्रेस छोड़ दी। दोनों का आजादी को पाने का तरीका अलग था। गांधीजी अहिंसा वादी नीति को अपनाते थे और सुभाष बाबू देश की आजादी के लिए कुछ भी करना चाहते थे। हालांकि गांधी जी को जब यह समझ में आया कि अब आजादी के लिए कुछ भी करना पड़ेग तब शायद देर हो चुकी थी। यह दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन 23 जनवरी को हम सभी पराक्रम दिवस के रूप में मनाते हैं इस दिन को मनाना बेहद खास है यह दिन उसके लिए समर्पित है जिस व्यक्ति ने देश की आजादी को साकार किया था। आप सभी को यह जानकारी अच्छी लगी होगी इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर जरूर करें। जय हिंद जय भारत