У нас вы можете посмотреть бесплатно Shunyata chha gayi ambar mein || शून्यता छा गई अंबर में,करुणा का सागर मौन हुआ ||CHANDRAGIRI, DGG или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
शून्यता छा गई अंबर में, करुणा का सागर मौन हुआ, साधना की शिखर शिखा बुझ गई, तप का सूर्य अंतर्धान हुआ। हे वीतराग! हे ज्ञानपुंज! तुम बिन ये वसुधा सूनी है, तपस्वी की उस पावन स्मृतियों से, आँखें आज नम-धुंधली हैं। नमोस्तु-नमोस्तु गूंज रहा है, दिशाएं करतीं क्रंदन हैं, शत-शत नमन हे विद्यासागर, चरणों में वंदन-अभिनंदन है। (अंतरा 1) तुमने 'प्रतिभास्थली' सजाकर, नारी शक्ति को मान दिया, संस्कारित शिक्षा का जग को, एक अनुपम वरदान दिया। 'ज्ञानोदय' के पावन प्रांगण, ज्ञान की रश्मि बिखेर रहे, विद्यापीठ के नन्हे राही, तव चरणों को घेर रहे। तुमने केवल अक्षर न बांटे, जीवन जीना सिखलाया, भारत की प्राचीन कला को, हथकरघा में पुनर्जीवित करवाया। (अंतरा 2) 'मूकमाटी' का महाकाव्य, माटी की व्यथा सुनाता है, एक शिल्पी कैसे बनता है, दर्शन तेरा समझाता है। स्वर्ण नहीं, तुम माटी की पावन सुगंध के राही थे, अहिंसा और अपरिग्रह के, तुम ही तो सच्चे सिपाही थे। वाणी में ओज, हृदय में करुणा, मुखमंडल पर अनुपम तेज था, दिगंबरत्व की उस चर्या में, बस आतम-बोध का साध्य था। (अंतरा 3) 'इंडिया' छोड़ो 'भारत' बोलो, पावन शंखनाद किया, स्वदेशी और स्वावलंबन का, जन-जन को बोध दिया। मूक पशुओं की पीड़ा देखी, 'दयोदय' का द्वार खुला, गौ-वंश की रक्षा का संकल्प, तव चरणों में आकर फला। तुम राष्ट्र-संत, तुम युग-मनीषी, भारत का गौरव कहलाए, निष्काम कर्म की ज्योति जलाकर, तुम सिद्धों की श्रेणी में आए। (अंतरा 4) चंद्रगिरि के उस उपवन में, जब महामौन तुमने धारा, पंचतत्व की देह को तजकर, आतम ने पाया ध्रुव तारा। सल्लेखना की कठिन डगर पर, अविचल तुम चलते ही रहे, तप की अग्नि में तपकर गुरुवर, कंचन सम ढलते ही रहे। गया न कोई छोड़ के हमको, तुम तो कण-कण में समाए हो, अपनी शिक्षा, अपने सिद्धांतों में, तुम अमर रूप में आए हो। (समर्पण) जब तक सूरज चांद रहेगा, नाम तुम्हारा गूंजेगा, हर श्रावक, हर मुनि हृदय, बस राह तुम्हारी पूजेगा। नमोस्तु-नमोस्तु गूंज रहा है, दिशाएं करतीं क्रंदन हैं, शत-शत नमन हे विद्यासागर, चरणों में वंदन-अभिनंदन है। #jaindharmikrules #pravacha #live #chandragiri #aacharyavidyasagar