У нас вы можете посмотреть бесплатно अन्धकासुर की तपस्या और शिव से युद्ध का कारण।ShivPuran| RudraSamhita।YudhKhand।Adhyay 44 или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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रुद्र संहिता॥युद्ध खंड॥अध्याय ४४ अन्धकासुरकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे अनेक वरोंकी प्राप्ति, त्रिलोकीको जीतकर उसका स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, मन्दिरोंद्वारा पार्वतीके सौन्दर्यको सुनकर मूर्ख हो शिवके पास सन्देश भेजना और शिवका उत्तर सुनकर क्रुद्ध हो युद्धके लिये उद्योग करना। शिवमहापुराण की रुद्र संहिता का यह अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय अन्धकासुर के जीवन की उस अवस्था का वर्णन करता है, जहाँ तपस्या से प्राप्त वरदान अहंकार में परिवर्तित हो जाता है और वही अहंकार अंततः विनाश का कारण बनता है। इस अध्याय में बताया गया है कि हिरण्याक्ष का पुत्र अन्धकासुर घोर तपस्या करता है। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा उसे अनेक अद्भुत वरदान प्रदान करते हैं। इन वरदानों के प्रभाव से अन्धकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है और धीरे-धीरे त्रिलोकी पर अधिकार स्थापित कर लेता है। देवता, दानव और मनुष्य — सभी उसके भय से त्रस्त हो जाते हैं। शक्ति प्राप्त होने के बाद अन्धकासुर का विवेक नष्ट हो जाता है। वह स्वेच्छाचारी और अहंकारी बन जाता है। इसी दौरान वह मुनियों के मुख से माता पार्वती के अनुपम सौन्दर्य के विषय में सुनता है। यह सुनते ही उसका मन विकृत हो जाता है और वह माता पार्वती को प्राप्त करने का दुराचारी विचार करने लगता है। अन्धकासुर अपनी मूर्खता में भगवान शिव को संदेश भिजवाता है, जिसमें वह पार्वती को देने की मांग करता है। यह संदेश शिवभक्तों के लिए अत्यंत पीड़ादायक और अधर्म से भरा हुआ होता है। भगवान शिव जब उस संदेश को सुनते हैं, तब वे अन्धकासुर को धर्म का उपदेश देते हैं और उसे चेतावनी देते हैं कि वह अपने पापपूर्ण विचारों को त्याग दे। किन्तु अहंकार में डूबा अन्धकासुर शिव के वचनों को स्वीकार नहीं करता। वह शिव के उत्तर से अत्यंत क्रोधित हो जाता है और भगवान शिव से युद्ध करने का निश्चय कर लेता है। इसी बिंदु से शिव और अन्धकासुर के महान युद्ध की भूमिका बनती है, जो आगे चलकर अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना का कारण बनती है। यह अध्याय हमें यह गहन शिक्षा देता है कि तपस्या और शक्ति यदि विवेक से रहित हो जाएँ, तो वे विनाश का कारण बनती हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि भगवान शिव करुणामय होते हुए भी अधर्म का नाश अवश्य करते हैं। शिवमहापुराण का यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और अहंकार के परिणाम को समझाने वाला दिव्य उपदेश है। प्रत्येक शिवभक्त और सनातन धर्म के अनुयायी को इस अध्याय का श्रवण अवश्य करना चाहिए। • अन्धकासुर कथा • अन्धकासुर की तपस्या • शिवमहापुराण अन्धकासुर अध्याय • शिव और अन्धकासुर युद्ध • रुद्र संहिता अध्याय 44 • अन्धकासुर वरदान कथा • ब्रह्मा से वरदान अन्धकासुर • त्रिलोकी विजय अन्धकासुर • पार्वती सौन्दर्य कथा • शिव को संदेश अन्धकासुर • शिवमहापुराण युद्ध प्रसंग #अन्धकासुर #ShivMahapuran #RudraSamhita #LordShiva #सनातन_धर्म #HinduMythology #ShivaKatha #PuranaKatha #shiv #shivpuran #shivpurankatha #shivpuranpath #sanatanigranthokapath #RockyHindustani #sanatandharma #sanatan