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मेरो है साँचो यार, नट नागर नंद कुमार, छवि कोटि काम बलिहार, सोई मम प्राणाधार। जो कनक मुकुट सिर धार, तनु नील जलद अनुहार, जेहि वेद न पायो पार, सोई मम प्राणाधार। जो हरि हरहूँ भरतार, लखि उमा रमा बलिहार, जो बन्यो भृत्य ब्रजनार, सोई मम प्राणाधार। जो प्रेम सुधा रस सार, जेहि छवि लखि छवि बलिहार, जो ललित त्रिभंगी यार, सोई मम प्राणाधार। जो यशुमति सुत रिझवार, जो जीवन धन ब्रजनार, जो नट वपु भेष सँवार, सोई मम प्राणाधार। जो रसिक प्राण साकार, जेहि लगि बनि गये शिव नार, जेहि महिमा अपरंपार, सोई 'कृपालु' सरकार ॥ भावार्थ - भक्त कहता है - श्रेष्ठ नट के समान चतुर श्रीकृष्ण ही मेरे सच्चे मित्र हैं। उनकी शोभा को निहारकर करोड़ों कामदेव बलिहार जाते हैं। वे ही श्रीकृष्ण मेरे प्राणों के एकमात्र अवलम्ब हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण का मुकुट है। शरीर का वर्ण नीले बादलों के समान है। जिसकी महिमा का गायन करने में वेद भी असमर्थता का अनुभव करते हैं, वे ही मेरे प्राणों के आश्रय हैं। जो श्रीकृष्ण महाविष्णु एवं शिव के भी स्वामी हैं। जिनकी मनोहर रूप-राशि पार्वती और महालक्ष्मी को भी लुभाने वाली है। जो ब्रजनारियों का खरीदा हुआ गुलाम बना है, वही नंदनंदन श्रीकृष्ण मेरे प्राणों के प्राण हैं। जो प्रेमामृत के भी सार स्वरूप हैं; जिसकी शोभा पर शोभा भी स्वयं को निछावर करती है, जो तीन स्थानों (ग्रीवा, कटि एवं चरण) से टेढ़े हैं, वे ही श्रीकृष्ण मेरे एकमात्र जीवन सर्वस्व हैं। जो यशोदा के प्रेम के कारण उनके पुत्र बन गये हैं, जो ब्रजगोपियों के जीवन-धन हैं, सुन्दर नट के समान जिन्होंने वेशभूषा धारण की है वे ही एकमात्र मेरे प्राणों के आधार हैं। रसिकों के प्राण स्वरूप श्रीकृष्ण जिनके रास-रस का आस्वादन करने के लिये शिव शिवानी बन गये। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं - जिनकी महिमा का पार शिव, शुक आदि भी नहीं पा सके वे श्रीकृष्ण ही मेरे प्राण स्वरूप हैं।