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एकादशोपनिषद्–प्रसाद की इस कड़ी में केनोपनिषद् के अत्यंत गहन और विचारोत्तेजक दार्शनिक सार पर प्रकाश डाला गया है। यह एपिसोड उस मूल प्रश्न की खोज करता है—आख़िर वह कौन-सी शक्ति है, जिसके कारण मनुष्य की आँखें देख पाती हैं और कान सुन पाते हैं? क्या इंद्रियाँ स्वयं में स्वतंत्र हैं, या उनके पीछे कोई और सूक्ष्म प्रेरक सत्ता कार्य कर रही है? इस प्रसंग में स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि दृष्टि और श्रवण जैसी इंद्रियाँ हमें संसार का अनुभव कराती हैं, किंतु उनकी वास्तविक क्षमता का स्रोत वे स्वयं नहीं हैं। केनोपनिषद् के अनुसार, वह अदृश्य और अज्ञेय सत्ता ब्रह्म है, जो इंद्रियों का आधार होते हुए भी स्वयं इंद्रियगोचर नहीं है। वह देखा नहीं जा सकता, सुना नहीं जा सकता, फिर भी वही देखने और सुनने की शक्ति प्रदान करता है। एपिसोड में विभिन्न उपनिषदों तथा भगवद्गीता के संदर्भों के माध्यम से यह समझाया गया है कि संसार का समस्त प्रकाश, ज्ञान और चेतना उसी परम तत्व से उत्पन्न होती है। हमारी सीमित बुद्धि और इंद्रियाँ उस अनंत सत्य को पूरी तरह पकड़ पाने में असमर्थ हैं, फिर भी वही सत्य हमारे प्रत्येक अनुभव का मूल आधार है। यह प्रस्तुति श्रोता को केवल दार्शनिक विचार नहीं देती, बल्कि उसे आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करती है—ताकि वह अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के पीछे छिपी उस दिव्य ऊर्जा को पहचान सके। अंततः यह एपिसोड हमें सिखाता है कि इंद्रियाँ साधन हैं, पर उनकी प्रेरक शक्ति ब्रह्म है, और उसी के बोध से जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होती है। यह कड़ी उन सभी जिज्ञासुओं के लिए उपयोगी है, जो यह जानना चाहते हैं कि देखने वाला कौन है, सुनने वाला कौन है, और ज्ञान का वास्तविक स्रोत क्या है।