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इक सैनिक को मिली है छुट्टी हुआ निकलने को तैयार। सन्देशा उसने भेजा है, साथ मनाएगा त्योहार। खुश होकर पूछें आपस में, कैसे होली खेलेंगे? सोच रहे हैं घरवाले सब, ऐसे होली खेलेंगे। "पापा आएँगे जब घर पर, लाएँगे वो पिचकारी। मैंने भी उनको रंगने की, कर ली पूरी तैयारी।" "रंग मिला पानी लेकर मैं, छत पर जा छुप जाऊँगा। जैसे ही पापा आएँगे, उनको फिर नहलाऊँगा।" माँ भी बोली हर्षित होकर, "पीछे से मैं आऊँगी। उनके चेहरे पर हाथों से गाढ़ा रंग लगाऊंगी "तेरे पापा के स्वागत में, द्वार बनी रंगोली है। हँसी-ठिठोली खूब करेंगे, बुरा न मानो होली है!" तुतला कर बोली गुड़िया मैं गुब्बाले भल लाऊंदी पापा के छल पल फोलूंगी खुच होकल चिल्लाऊंदी हँछेंगे पापा खूब मुदे फिर अपनी गोद उथाएंगे छाथ बैतकर हम मिलतर फिल दुजिया, पापल थायेंदे बेंत पकड़कर दादा बोले, "पिछली बार नहीं आया। खबर मैं लूँगा उसकी अब क्यों हमको इतना तड़पाया!" सुनकर दादा की बातें सब, खिलखिलाकर हँसते हैं। बच्चों में ही मात-पिता के, प्राण सदा ही बसते हैं। दादी बोली "चुप करिए जी! उसको आ तो जाने दो। आँखों को ठंडक मिल जाए, कसकर गले लगाने दो।" "मुझे पता है देखते ही, वो मुझको गोद उठा लेगा। कितने दिनों के बाद मुझे वो सामने से 'माँ' बोलेगा।" तभी अचानक आहट सुनकर, दरवाजे पर सब आए। देखा कुछ सैनिक कंधे पर, क्षत विक्षत इक शव लाए! "नहीं हमारा ये बेटा है!" चीखे "किसका लाल है ये?" रोकर दादा-दादी बोले "लगे किसी की चाल है ये! इक सैनिक ने झुका के सिर को कागज़ एक थमाया है उसमें किसी ने खून से अपने एक परिवार बनाया दो चोटी वाली गुड़िया है, हाथ लिए जो गुब्बारे। गुड्डा भी इक बैठाया जो पिचकारी रंग डारे। उन बच्चों को लिए हुए, नारी चित्र बनाया है। जिसने भी देखा वो मंजर, मुँह को कलेजा आया है। बगल में बूढ़ी माँ के दोनों, हाथ दुआ में उठे हुए। वृद्ध पिता लाठी के सहारे, पास ही उनके खड़े हुए। कुछ दूरी पर बाँहें खोले, एक पुरुष है खड़ा हुआ। शीश के ऊपर बना तिरंगा, 'वन्दे मातरम्' लिखा हुआ। लिखा हुआ है खून सने ख़त पर के याद मुझे करना आ न सका मैं होली पर, पर दिल से माफ़ मुझे करना।" "हम सैनिक घर निकले ही थे, दुश्मन हमलावर हुआ। कुछ गीदड़ों का हम शेरों पर फिर छुपकर वार हुआ "पर डरे नहीं, हमने दिवाली दुश्मन संग मना डाली! उनके खून से होली खेली, रण-उत्सव की मना लाली!" "लड़ते-लड़ते घायल होकर, खत में अपना हाल लिखा। अपने लहू से चित्र बनाया, सबको अपना प्यार लिखा।" "सुनो प्रिये! तुम रोना मत, मेरा किरदार निभाना है। बच्चों के संग माँ और बाबूजी, को धैर्य बँधाना है।" "गुड्डू और मेरी बिट्टो को, सेना में भर्ती करना। राष्ट्र रहेगा सर्वोपरि ही, इतना ध्यान सदा रखना।" "चूम रहा हूँ चित्र को मैं, और अपनों का अहसास हुआ। मेरी भारत माँ की जय हो!" अंत में इतना लिखा हुआ। धरती-अम्बर काँप उठे, और काली घटाएँ बरस गईं। कितनी आँखें उसकी तो बस, एक झलक को तरस गईं। सिर पर हाथ धरे कोई बैठा, कोई लिपट कर चिल्लाया। आंसू के उस महासमर को, कोई रोक नहीं पाया। दुश्मन के हित वज्र हैं जो, हैं उनके दिल मासूम बड़े। छोड़ के अपनों को सरहद पर, देखो कितने वीर खड़े। जिनके लिए ये देश प्रथम है, बाद में घर के सब त्योहार। ऐसे वीर सपूतों को हम, नमन करेंगे बारम्बार।