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श्रीमद्भागवत गीता का हर श्लोक केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा से आत्मा की बातचीत है। इस वीडियो में हम समझते हैं *अध्याय 6 | श्लोक 31* — जहाँ श्रीकृष्ण योगयुक्त चेतना की सबसे ऊँची अवस्था का संकेत देते हैं। जो योगी मुझे सर्वत्र देखता है और मुझमें ही सबको देखता है, वह कभी मुझसे अलग नहीं होता।* यह व्याख्या केवल intellectual explanation नहीं है, बल्कि *inner experience* की ओर इशारा करती है। यह श्लोक सिखाता है कि जब “मैं” और “तू” का भेद मिट जाता है, तभी *सच्चा योग* घटित होता है। इस वीडियो में आप जानेंगे: योग का वास्तविक अर्थ (beyond posture & breath) Self और Universe का गहरा संबंध Non-duality (अद्वैत) का practical meaning क्यों सच्चा योगी कभी अकेला नहीं होता यदि आप भी **आत्म-खोज (Self Inquiry)**, **ध्यान**, और *तत्त्व ज्ञान* की यात्रा पर हैं, तो यह वीडियो आपके लिए है। देखिए, सुनिए, और अपने भीतर उतरिए। *तत्त्व यात्रा* — जहाँ शास्त्र, अनुभव बन जाते हैं। ---