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“आशी कशी गं तू खुळी” एक गहन आत्मचिंतनात्मक मराठी गीत है — जो बाहरी दिखावे, कर्तृत्व के अहंकार और जीवन की धाव-पलट के पार अंदर की रिक्तता, कोमलता और सत्य से साक्षात्कार कराता है। यह गीत प्रश्न नहीं करता, बल्कि आईने की तरह सामने रख देता है — कि हम कितनी सहजता से अपने ही भीतर से दूर हो जाते हैं। इस गीत के शब्द Sangeeta Hegde (संगीता दीदी) द्वारा रचित हैं, जो Art of Living की एक समर्पित शिक्षिका (Teacher) हैं। उनके शब्दों में केवल काव्य नहीं, बल्कि साधना, अनुभव और मौन की परिपक्वता झलकती है। कृष्ण की बांसुरी यहाँ केवल भक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि अंतर्मन की पुकार है — जो जाणीव करून देते की जेव्हा “मी” थांबते, तेव्हा “संगीत” सुरू होतं। यह गीत सुनने के लिए नहीं, ठहरने के लिए है। नाचते हुए जीवन को एक क्षण के लिए रोककर, अपने भीतर झांकने के लिए। 🎶 शब्द: Sangeeta Hegde 🕊️ प्रेरणा: भक्ति, आत्मचिंतन और अंतर्मुखता अगर यह गीत आपके भीतर कुछ शांत करता है — तो समझिए, वही इसका उद्देश्य था।