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ओशो एक समकालीन प्रबुद्ध रहस्यवादी, दूरदर्शी और विद्रोही थे। उनका जन्म 1931 में भारत के छोटे से शहर कुचवाड़ा में हुआ था। 21 मार्च 1953 को इक्कीस वर्ष की आयु में ओशो को ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने सत्तर के दशक के आरंभ में अपना आध्यात्मिक कार्य शुरू किया और देखते ही देखते दुनिया भर के साधकों का ध्यान आकर्षित किया। हजारों युवा उनकी उपस्थिति में ध्यान करने के लिए भारत के पुणे स्थित उनके आश्रम में आने लगे। बाद में 1981 में, ओशो अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने अपना आध्यात्मिक आश्रम, रजनीशपुरम स्थापित किया। 1985-1986 के दौरान ओशो ने विश्व यात्रा भी की और हिमालयी राज्य नेपाल सहित 21 विभिन्न देशों की यात्रा की, जहाँ वे 40 दिनों से अधिक समय तक रहे। ओशो का उद्देश्य एक नए प्रकार के मानव के जन्म के लिए परिस्थितियाँ बनाना था। वे अक्सर इस नए मनुष्य को “ज़ोरबा द बुद्धा” के रूप में वर्णित करते हैं – जो ज़ोरबा द ग्रीक के प्रेम और सांसारिक सुखों का आनंद लेने के साथ-साथ गौतम बुद्ध की मौन शांति में भी लीन रहता है। इस नए मनुष्य के प्रति उनकी दृष्टि एक ऐसे एकीकृत मानव की है जो पूर्व और पश्चिम, धरती और आकाश, भौतिकवाद और आध्यात्मिकता का संश्लेषण है। ओशो के हजारों प्रवचनों और असंख्य ध्यान सत्रों में एक सामान्य विषय है जो उनकी उस दृष्टि को समाहित करता है जिसमें सभी युगों के शाश्वत ज्ञान और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उच्चतम क्षमता दोनों समाहित हैं।