У нас вы можете посмотреть бесплатно आस्था परंपरा और लोकसंस्कृति का विराट उत्सव पांगी के पूर्थी में बारह दिवसीय जुकारू मेले भव्य समापन или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
शिव सूर्यवंशी PANGI NEWS 24 जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में आयोजित पारंपरिक बारह दिवसीीय जुकारू मेले का आज पूर्थी गांव में अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक वैभव के साथ समापन हो गया। यह ऐतिहासिक एवं धार्मिक मेला पूर्थी स्थित पवित्र मां मालासनी माता मंदिर में आयोजित किया गया, जहाँ दूर-दराज के गांवों से आए श्रद्धालुओं ने भारी संख्या में भाग लिया। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पांगी घाटी की सामाजिक एकता, पारंपरिक व्यवस्था और समृद्ध लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है। बारह दिनों तक चले इस उत्सव का अंतिम दिन पूर्थी में विशेष महत्व रखता है, जिसमें चार प्रमुख प्रजामण्डलों — शौर, थांदल, पूर्थी और रेई — ने अपनी पारंपरिक भागीदारी निभाई। सुबह से उमड़ा जनसैलाब सुबह होते ही पूर्थी गांव में उत्सव का माहौल बन गया। लोग पारंपरिक पांगवाली वेशभूषा में सुसज्जित होकर ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ मेला स्थल की ओर रवाना हुए। महिलाओं की रंग-बिरंगी पोशाकें, पुरुषों की पारंपरिक टोपी और युवाओं का उत्साह पूरे गांव को जीवंत बना रहा था। हर चेहरे पर श्रद्धा और उत्सव की चमक साफ झलक रही थी। भव्य शोभायात्रा ने बांधा समां मेले का सबसे आकर्षक दृश्य शौर, थांदल और रेई प्रजामण्डलों की भव्य शोभायात्रा रही। सजे-धजे रथ, पारंपरिक ध्वज, लोक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि और जयकारों के बीच निकली यह शोभायात्रा दर्शनीय थी। श्रद्धालु माता के जयघोष करते हुए अनुशासित रूप से आगे बढ़ते रहे। पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो संपूर्ण घाटी आस्था के रंग में रंग गई हो। माता के पवित्र स्वरूप ‘कुकड़ी’ का आगमन विशेष और भावुक क्षण तब आया जब मां मालासनी माता जी के पवित्र स्वरूप ‘कुकड़ी’ का मेला स्थल में आगमन हुआ। जैसे ही माता का प्रवेश हुआ, श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। ढोल-नगाड़ों की गूंज, शंखनाद और जयकारों के बीच वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं ने माता के चरणों में शीश नवाकर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की। पारंपरिक ‘खेला’ और लोकनृत्य माता के आगमन के पश्चात भक्तों द्वारा पारंपरिक ‘खेला’ की रस्म अदा की गई, जो इस मेले की विशेष पहचान मानी जाती है। इसके बाद विभिन्न प्रकार के पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए गए। युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने एक साथ मिलकर लोकधुनों पर नृत्य किया, जिसने मेले की रौनक को चरम पर पहुँचा दिया। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी है। लोकगीतों के माध्यम से क्षेत्र के इतिहास, देवी-देवताओं की महिमा और सामाजिक मूल्यों का संदेश दिया गया। सामाजिक एकता का प्रतीक जुकारू मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह चारों प्रजामण्डलों के बीच भाईचारे, सामंजस्य और सामूहिक परंपरा का प्रतीक है। यह आयोजन पांगी घाटी की विशिष्ट जनजातीय पहचान को सुदृढ़ करता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का माध्यम बनता है। जनजातीय जिला चंबा जिला तथा प्रदेश हिमाचल प्रदेश के लिए ऐसे पारंपरिक मेले सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो राज्य की विविधता और आध्यात्मिक समृद्धि को दर्शाते हैं। उल्लास का अविस्मरणीय दृश्य पूर्थी गांव में मेले का उल्लास देखते ही बनता था। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस आयोजन का हिस्सा बने। मेले ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी पांगी की पारंपरिक संस्कृति और आस्था पूरी मजबूती के साथ जीवित है। बारह दिवसीय इस भव्य आयोजन का समापन श्रद्धा, आनंद और सामूहिक उत्साह के साथ हुआ, लेकिन इसकी स्मृतियाँ लंबे समय तक लोगों के मन में जीवित रहेंगी। #JukaruMela #PangiValley #PurthiVillage #MaaMalasniMata #ChambaDistrict #HimachalPradesh #TribalFestival #DevotionalCelebration #FolkCulture #CulturalHeritage #IncredibleIndia #TraditionalFair