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“गुस्सा तुम्हें बर्बाद कर देगा” — प्रेमानंद जी महाराज की दृष्टि से जीवन का सत्य प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं—मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, भीतर छिपा होता है। वही शत्रु है क्रोध। गुस्सा वह आग है, जो पहले मन को जलाती है, फिर बुद्धि को भस्म करती है और अंत में जीवन की शांति, संबंध और भक्ति—सब कुछ राख कर देती है। जो व्यक्ति अपने गुस्से को नहीं पहचानता, वह धीरे-धीरे अपने ही हाथों अपना पतन लिख देता है। 1. गुस्सा क्या है और यह क्यों आता है? गुस्सा तब पैदा होता है जब इच्छा पूरी नहीं होती, अहंकार को चोट लगती है, या अपेक्षाएँ टूटती हैं। मन कहता है—“मेरे अनुसार क्यों नहीं हुआ?” यही “मैं” का भाव क्रोध को जन्म देता है। महाराज समझाते हैं कि जब तक ‘मैं’ बड़ा है, तब तक गुस्सा छोटा नहीं होगा। क्रोध का मूल कारण असंतोष है। जो भीतर से भरा हुआ है, उसे बाहर से कुछ छीन भी लिया जाए तो वह शांत रहता है; और जो भीतर से खाली है, वह छोटी-सी बात पर भी भड़क उठता है। 2. क्रोध का पहला शिकार—बुद्धि गीता में कहा गया है—क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रंश और स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश होता है। प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि गुस्से के क्षण में मनुष्य गलत निर्णय करता है। शब्द ऐसे निकलते हैं जिन्हें वापस नहीं लिया जा सकता, और कर्म ऐसे हो जाते हैं जिनका पश्चाताप जीवन भर पीछा करता है। एक पल का क्रोध वर्षों की साधना, रिश्तों की मेहनत और प्रतिष्ठा को मिटा सकता है। 3. संबंधों का विनाश घर-परिवार में गुस्सा सबसे पहले प्रेम को मारता है। पति-पत्नी, माता-पिता और संतान—सबसे मीठे रिश्ते क्रोध की आँच में कड़वे हो जाते हैं। महाराज कहते हैं—जहाँ गुस्सा रहता है, वहाँ संवाद मर जाता है। गुस्से में बोला गया एक वाक्य, वर्षों की सेवा और स्नेह पर भारी पड़ जाता है। बाद में माफी भी मांगी जाए, तो भी मन में पड़ी खरोंच पूरी तरह मिटती नहीं। 4. स्वास्थ्य पर क्रोध का प्रभाव क्रोध केवल मन की बीमारी नहीं, शरीर की भी बीमारी है। उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, नींद की समस्या, पेट की गड़बड़ी—ये सब गुस्से की देन हैं। प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं—जो शांत है, वही स्वस्थ है। जिस शरीर में क्रोध की गर्मी रहती है, वहाँ भक्ति की शीतलता कैसे ठहरेगी? 5. भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु भक्ति का अर्थ है—समर्पण और प्रेम। और क्रोध का स्वभाव है—विरोध और हिंसा (मन की)। इसलिए जहाँ क्रोध है, वहाँ भक्ति टिक नहीं सकती। महाराज कहते हैं—नाम जप करते हुए भी यदि मन में क्रोध भरा है, तो जप का रस नहीं आएगा। पहले मन को शांत करो, फिर नाम अपने आप गहरे उतरेगा। 6. अहंकार और क्रोध क्रोध का जुड़वां भाई अहंकार है। जब अहंकार को चोट लगती है, क्रोध भड़क उठता है। जो व्यक्ति स्वयं को बड़ा मानता है, वही जल्दी नाराज़ होता है। प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं—जो अपने को कुछ नहीं मानता, उसे अपमान भी नहीं छूता। नम्रता क्रोध की दवा है। 7. गुस्सा दूसरों को नहीं, तुम्हें जलाता है एक बड़ी भूल यह है कि हम सोचते हैं—“मैं गुस्सा करके सामने वाले को सजा दे रहा हूँ।” सच यह है कि क्रोध सबसे पहले स्वयं को सजा देता है। महाराज कहते हैं—क्रोध पीने वाला जहर खुद पीता है और उम्मीद करता है कि दूसरा मर जाएगा। यह भ्रम ही विनाश का कारण है। 8. क्षमा—कमज़ोरी नहीं, शक्ति क्षमा को लोग कमज़ोरी समझते हैं, पर प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं—क्षमा वीरों का आभूषण है। क्षमा वह शक्ति है जो क्रोध की जड़ काट देती है। जिसने क्षमा सीख ली, उसने जीवन का सबसे बड़ा युद्ध जीत लिया। 9. क्रोध पर विजय कैसे पाएं? महाराज सरल उपाय बताते हैं: (क) मौन का अभ्यास जब क्रोध आए, बोलना बंद कर दो। शब्द ही आग में घी डालते हैं। मौन आग को खुद बुझा देता है। (ख) नाम स्मरण “राधा-राधा” या अपने इष्ट का नाम भीतर-भीतर जपो। नाम में शीतलता है, जो क्रोध की गर्मी को शांत कर देती है। (ग) श्वास पर ध्यान गहरी सांस लो। क्रोध में सांस तेज होती है। सांस को शांत करो, मन अपने आप शांत होगा। (घ) अपेक्षा कम करो जितनी अपेक्षा, उतना क्रोध। अपेक्षा घटाओ, शांति बढ़ाओ। (ङ) सेवा का भाव जो सेवा में रहता है, उसका अहंकार पिघलता है और क्रोध स्वतः कम होता है। 10. क्रोध और कर्म क्रोध में किया गया कर्म भारी कर्मबंधन बनता है। महाराज कहते हैं—क्रोध से निकला हर कर्म, भविष्य में दुःख बनकर लौटता है। जो आज गुस्से में किसी का दिल तोड़ता है, कल उसका दिल भी किसी न किसी रूप में टूटता है—यही कर्म का न्याय है। 11. शांत व्यक्ति की पहचान शांत व्यक्ति परिस्थितियों से नहीं हिलता। अपमान में भी उसका संतुलन बना रहता है। प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं—शांति कमजोरी नहीं, यह आत्मबल का प्रमाण है। जिसके भीतर शांति है, वही सच्चा धनी है। 12. जीवन का सार अंत में महाराज का संदेश बहुत स्पष्ट है— क्रोध को पालोगे तो वह तुम्हें खा जाएगा। शांति को पालोगे तो वह तुम्हें बचा लेगी। जीवन बहुत छोटा है। इसे गुस्से में जलाने के लिए नहीं, प्रेम में जीने के लिए मिला है। अपने मन को समझो, अहंकार को छोटा करो, और क्षमा को गले लगाओ। तभी सच्ची भक्ति, सच्चा सुख और सच्ची शांति जीवन में उतर पाएगी। याद रखो—गुस्सा तुम्हें बर्बाद कर देगा, और शांति तुम्हें परम आनंद तक पहुँचा देगी।