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*श्री कृष्ण का ‘रणछोड़’ नाम कैसे पड़ा? (प्रेमानंद जी महाराज के मुख से शैली में)* सुनिए भक्तों… यह लीला बड़ी अद्भुत है। जब *श्री कृष्ण* मथुरा में थे, तब *जरासंध* ने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया। कहते हैं कि उसने 17 बार आक्रमण किया और हर बार प्रभु ने उसे पराजित किया। लेकिन प्रभु की लीला केवल युद्ध जीतना नहीं होती—वह अपने भक्तों की रक्षा के लिए होती है। 18वीं बार जब जरासंध फिर विशाल सेना लेकर आया, तब प्रभु ने देखा कि यदि युद्ध लंबा चला तो मथुरा की प्रजा को भारी कष्ट होगा। उसी समय *कालयवन* भी आक्रमण के लिए आ पहुँचा। दो-दो शक्तिशाली शत्रु सामने थे। अब देखिए प्रभु की लीला… उन्होंने सोचा—“मेरे कारण मेरी प्रजा को कष्ट न हो।” और वे रणभूमि छोड़कर द्वारका की ओर चले गए। बाहर से देखने वालों को लगा कि कृष्ण युद्ध छोड़कर भाग गए। इसलिए लोगों ने उन्हें ‘रणछोड़’ कहा—अर्थात् ‘रण’ (युद्ध) को ‘छोड़ने वाला’। लेकिन भक्तजन समझते हैं— यह भय से नहीं, करुणा से था। यह पराजय नहीं, बल्कि एक दिव्य रणनीति थी। प्रभु ने द्वारका बसाई, अपनी प्रजा को सुरक्षित स्थान दिया और फिर समय आने पर धर्म की स्थापना की। इसलिए गुजरात के *रणछोड़राय मंदिर* में भगवान को ‘रणछोड़राय’ के नाम से पूजा जाता है। वहाँ यह नाम प्रेम और महिमा का प्रतीक है, न कि उपहास का। तो भक्तों… ‘रणछोड़’ नाम हमें यह सिखाता है कि कभी-कभी पीछे हटना भी विजय का मार्ग होता है, यदि वह धर्म और लोककल्याण के लिए हो। राधे-राधे 🙏