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परम अध्यात्म मंदिर का , मै अकृतिम प्रभु ही हु , समर्पित निज के दर्शक को, निरंतर दर्श देता हु,,। जो आवे शरण में मेरी,उसे आशीष वर्षण हु। सहज सुख, शांति पावनता उसे तत्क्षण ही देता हु। है मेरा दर्श सम्यक दर्श ,सम्यक ज्ञान मेरा ज्ञान। लीनता मुझमें ही चरित्र, रत्नात्रय जन्म भूमि हु। परम मंगल हु सर्वोत्तम, परम आश्रय शरण जग में। मै शरणागत का रक्षक हु,अभय मुक्ति प्रदाता हु परम ध्रुव ही मेरा आसान,परम ज्ञायक मेरा जीवन। परम निरपेक्ष हु जग से ,परिणामिक विभु हु मैं। परम आह्लाद, सुख सागर, अनंतों शक्तियां उछले। स्वयं स्व में प्रतिष्ठित हु,स्वयं स्व का विधाता हु। अकारक हु आवेदक हु, कहु क्या मै तो मैं ही हु। मै अतिक्रांत पक्षों से मात्र चैतन्य मूर्ति ही। प्रगट अंदर में मंदिर को, लखे कोई दिव्यदृष्टि से। स्वयं परमात्मा बनता,सदा परमात्मा मै ही हु। पुजारी पूज्य भावों के , विकल्पों का विलय होवे,न दिखे भेद कुछ भी अब, शुद्ध अनुभूतिमय मैं ही हु। परम अध्यात्म मंदिर का मै अकृतिम प्रभु ही हु ,समर्पित निज के दर्शक को,,, निरंतर दर्श देता हु,,,,।