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अगर संसार सचमुच एक सपना है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—हम जाग क्यों नहीं जाते? अष्टावक्र, रमण महर्षि और अद्वैत वेदांत कहते हैं कि समस्या सपना होने की नहीं, सपने से तादात्म्य की है। हम जाग नहीं पाते क्योंकि हम सपने को सच मान बैठे हैं। जिस तरह रात के सपने में सब कुछ वास्तविक लगता है—दुख, डर, खुशी—वैसे ही यह संसार भी तब तक वास्तविक लगता है, जब तक “मैं कौन हूँ?” का प्रश्न नहीं उठता। जागना कोई क्रिया नहीं, बल्कि पहचान का टूटना है। हम इसलिए नहीं जागते क्योंकि मन को सपना पसंद है—उसमें सुरक्षा, पहचान और कहानी है। अहंकार इसी कहानी से जीवित रहता है। जैसे ही साक्षी भाव जागता है, सपना ढीला पड़ने लगता है। यह जागरण बाहर की दुनिया छोड़ने से नहीं, बल्कि भीतर की गलत पहचान छोड़ने से आता है। संसार वहीं रहता है, पर बंधन नहीं रहता। यही आत्मज्ञान है—यही असली जागना।