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भारत का संविधान किसी एक धर्म, पंथ या संप्रदाय की जय के लिए नहीं बना है, बल्कि अधर्म, अन्याय, भेदभाव और समाज को तोड़ने वाली शक्तियों का नाश करने के लिए बना है। हमारे संविधान निर्माताओं की सोच बहुत स्पष्ट थी—देश तभी आगे बढ़ेगा जब समाज में समानता, न्याय, बंधुत्व और एकता होगी। केवल नारे लगाने से धर्म की रक्षा नहीं होती, बल्कि अधर्म का नाश करने से ही सच्चे अर्थों में धर्म की स्थापना होती है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में “धर्म” शब्द को आस्था और नैतिक मूल्यों के व्यापक अर्थ में समझा गया है, जबकि “रिलिजन” को कानून के दायरे में सीमित स्वतंत्रता दी गई है—जो Public Order, Health और Morality के अधीन है। इस वीडियो में हम इसी मूल विचार पर चर्चा करते हैं कि भारत का संविधान हमें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ स्वतंत्रता देता है। इसका मतलब यह है कि आप अपने विश्वास का पालन कर सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी कार्य नहीं कर सकते जो समाज की शांति, सार्वजनिक व्यवस्था या किसी दूसरे के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा बने। यही संतुलन भारत की संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। आज के समय में सबसे बड़ा प्रश्न “माइनोरिटी” (अल्पसंख्यक) की परिभाषा को लेकर खड़ा होता है। संविधान में “Minority” शब्द का प्रयोग तो है, लेकिन आज तक इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है कि माइनोरिटी किसे कहा जाएगा, उसकी यूनिट क्या होगी, वह राष्ट्रीय स्तर पर तय होगी या राज्य या जिला स्तर पर, और कितने प्रतिशत जनसंख्या को माइनोरिटी माना जाएगा। जब किसी शब्द की स्पष्ट परिभाषा ही नहीं होगी, तो उसके आधार पर नीति, कानून और फैसले कैसे पूरी तरह न्यायसंगत हो सकते हैं? यह सवाल न केवल कानूनी है, बल्कि सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में शिक्षा का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत का संविधान समान अवसर (Equal Opportunity) की बात करता है, लेकिन जब देश में दर्जनों शिक्षा बोर्ड, अलग-अलग सिलेबस और अलग-अलग स्तर की शिक्षा व्यवस्था चल रही हो, तो वास्तविक समानता कैसे आएगी? आज हालत यह है कि एक ही देश में 60 से ज्यादा तरह के पाठ्यक्रम और बोर्ड चल रहे हैं, जबकि प्रतियोगी परीक्षाएँ—जैसे JEE, NEET, NDA, UPSC—पूरे देश के लिए एक जैसी होती हैं। जब परीक्षा एक है, तो तैयारी और शिक्षा का आधार अलग-अलग क्यों? इतिहास गवाह है कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में राजा और प्रजा, अमीर और गरीब, सभी एक साथ पढ़ते थे। श्रीराम और निषादराज, कृष्ण और सुदामा जैसे उदाहरण यह बताते हैं कि शिक्षा कभी वर्गों में बंटी हुई नहीं थी। यही सामाजिक समरसता की असली जड़ थी। आज अगर हमें फिर से समाज में भाईचारा, समानता और एकता स्थापित करनी है, तो Uniform Education System यानी “एक देश, एक शिक्षा प्रणाली” की ओर गंभीरता से सोचना होगा—कम से कम दसवीं कक्षा तक तो यह लागू होना ही चाहिए। दुनिया के कई बड़े देशों—जैसे चीन और अमेरिका—में बड़े क्षेत्रफल और बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद एक समान शिक्षा प्रणाली सफलतापूर्वक लागू है। फिर भारत में यह असंभव क्यों माना जाता है? अगर एक रेलवे बोर्ड पूरे देश में ट्रेन चला सकता है, अगर एक टैक्स सिस्टम (GST) पूरे देश में लागू हो सकता है, तो एक शिक्षा बोर्ड पूरे देश में क्यों नहीं चल सकता? यह वीडियो इसी बड़े सवाल पर केंद्रित है—क्या हम सच में सामाजिक समरसता चाहते हैं या केवल उसके नारे लगाते रहेंगे? क्या हम चाहते हैं कि किसान का बच्चा और मंत्री का बच्चा, मजदूर का बच्चा और अधिकारी का बच्चा, एक ही किताब पढ़े और एक ही स्तर की शिक्षा पाए? क्योंकि जब शिक्षा समान होगी, तभी अवसर वास्तव में समान होंगे, और तभी समाज में असली न्याय और एकता आएगी। #IndianConstitution #ConstitutionOfIndia #UniformEducationSystem #OneNationOneEducation #EducationReformIndia #SocialHarmony #SocialEquality #EqualOpportunity #UnityInDiversity #IndianEducation #EducationSystemIndia #GurukulSystem #MinorityDebate #ConstitutionalValues #IndianDemocracy #RuleOfLaw #SecularismInIndia