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कंस का राक्षस करता था इस वन में खेती! वृन्दावनवासी फलों को छू भी नहीं सकते| श्रीकृष्ण काल की कथा कृष्ण अपने सखाओं तथा बलराम सहित जंगल में प्रविष्ट हुए और अनुकूल वातावरण देखकर उन्होंने जी भर कर आनंद लूटने की इच्छा की . कृष्ण ने देखा कि सारे वृक्ष फलों से लदे और नई-नई टहनियां नीचे आकर पृथ्वी का स्पर्श पर कर रही हैं. मानों व उनके चरण कमलों का स्पर्श करके उनका स्वागत कर रही हों. वे वृक्षों, फूलों तथा फलों के इस तरह के भाव से अत्यंत प्रसन्न थे और उनकी इच्छा जानकर हंसने लगे. कृष्ण और बलराम ने प्रथम दिवस प्रकृति का आनंद लिया फिर अपनी- अपनी गायों पर ध्यान दिया. इसके बाद एक बार वन जाना तो अब यह उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया. इस प्रकार कृष्ण तथा बलराम दोनों ही यमुना नदी तट पर अपने बछड़ों तथा गायों को चराते हुए ब्रजवासियों को पूर्ण रूप से आनंदित करने लगे. कुछ स्थानों में कृष्ण तथा बलराम के साथ उनके शखा भी होते. यह बालक गाते, भौरों के गुन-गुन की नकल उतारते और पुष्प हारों से विभूषित कृष्ण तथा बलराम के साथ चलते. धेनुकासुर एक गधे के रूप में तालवन में अपने शेष असुरों के साथ रहता था. उस ताल में कोई भी जाने का साहास नहीं करता .जो भी जाता उसे धेनुकासुर अपनी दुलत्ती से मार डालता. यह वन ताड़ के वृक्षों से पूर्ण है और सारे वृक्ष फलों से लदे हैं. इन फलों में कुछ गिर चुके हैं और कुछ वृक्ष पर ही अभी भी पके हुए लदे हैं. यह अत्यंत रमणीय स्थान है, किंतु महान असुर धेनुकासुर के कारण वहां जाना अत्यंत कठिन है. कोई भी जाकर वृक्षों के फल नहीं ला सकता. हे कृष्ण तथा बलराम ! यह असुर एक गधे के रूप में वहां रहता है और उसके साथ वैसा ही रूप धारण करके दुसरे असुर भी रहते हैं. वे सब के सब अत्यंत बलशाली है. अतः उस स्थान तक पहुंचना बहुत कठिन है. प्रिय भाइयों तुम ही दोनों एकमात्र ऐसे पुरुष हो, जो इन राक्षसों को मार सकते हो. प्राण- भय से वहां आपके अतिरिक्त कोई नहीं जा सकता.यहां तक कि पशु-पक्षी भी नहीं जाते और वहां एक भी पक्षी निवास नहीं करता. सबों ने बसेरा छोड़ दिया है. केवल उस स्थान से आने वाली सुगंध का ही आनंद लूटा जा सकता है. ऐसा प्रतीत होता है कि अभी तक उन मधुर फलों का किसी ने स्वाद नहीं चखा है. हे कृष्ण ! हम तुमसे स्पष्ट कह देते हैं कि हम इस मधुर सुगंध से अत्यंत आकर्षित हैं. हे बलराम ! यदि तुम चाहो तो चलकर इन फलों का आनंद लिया जाए. इन फलों की सुगंध चारों ओर फैल रही है. क्या तुम्हें यहां उनकी सुगंध नहीं आ रही? जब बलराम तथा कृष्ण से उनके घनिष्ठ मित्रों ने इस तरह प्रार्थना की तो वे उन्हें प्रसन्न करने के उद्देश्य से अपने मित्रों के साथ हंसते हुए उस वन की ओर चल पड़े. तालवन में प्रवेश करते ही बलराम अपनी हाथी जैसी शक्ति को दिखाते हुए वृक्षों को हिलाने लगे. इस झटके से सारे पके हुए फल पृथ्वी पर आ गिरे. फल गिरने की आवाज सुनकर वहां पर गधे के वेश में निवास कर रहा धेनुकासुर उस और तेजी से बढ़ने लगा. इससे सारी धरती और सारे वृक्ष हिलने लगे. मानो भूकंप आ गया हो. सर्व प्रथम यह असुर बलराम के समक्ष प्रकट हुआ और उनकी छाती पर अपनी पिछली टांगों से दुलत्ती मारी. बलराम पहले पहले कुछ नहीं बोले. किंतु वह असुर अब अधिक बलपूर्वक तेजी से लात मारने लगा. इस प्रकार बलराम ने तुरंत ही अपने एक हाथ से उस गधे के पैर पकड़ कर उसे चारों और घुमाकर वृक्ष की चोटी पर फेंक दिया