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महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण की भूमिका को केवल एक 'सारथी' या 'सलाहकार' के रूप में देखना अधूरी दृष्टि होगी। उनकी भूमिका एक सूत्रधार (Director) की थी, जो पर्दे के पीछे रहकर पूरी घटनाक्रम को धर्म की स्थापना की ओर मोड़ रहे थे।उनकी असली भूमिका को इन पाँच प्रमुख आयामों में समझा जा सकता है:१. अस्त्रविहीन योद्धा (The Unarmed Warrior)युद्ध शुरू होने से पहले ही कृष्ण ने यह शर्त रखी थी कि वे शस्त्र नहीं उठाएंगे। यह उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूमिका थी।रहस्य: उन्होंने यह संदेश दिया कि युद्ध केवल शारीरिक बल से नहीं, बल्कि बौद्धिक बल और सही दिशा (Strategy) से जीते जाते हैं। कौरवों ने कृष्ण की 'नारायणी सेना' चुनी, जबकि अर्जुन ने केवल 'निहत्थे कृष्ण' को। अंत में, कृष्ण की दृष्टि सेना की संख्या पर भारी पड़ी।२. धर्म के रक्षक और मनोवैज्ञानिक (The Psychologist)कुरुक्षेत्र की भूमि पर अर्जुन युद्ध छोड़कर भागने को तैयार थे। अगर अर्जुन युद्ध नहीं लड़ते, तो अधर्म की जीत निश्चित थी।भूमिका: कृष्ण ने वहां एक काउंसलर की भूमिका निभाई। उन्होंने अर्जुन के मानसिक द्वंद्व को खत्म कर उसे 'स्वधर्म' की याद दिलाई। गीता का उपदेश केवल ज्ञान नहीं था, वह अर्जुन को मानसिक रूप से युद्ध के लिए तैयार करने की एक अनिवार्य प्रक्रिया थी।३. रणनीतिकार और ढाल (The Strategic Shield)पांडवों की जीत लगभग असंभव थी क्योंकि कौरव पक्ष में भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे अजेय योद्धा थे। कृष्ण ने युद्ध में 'कूटनीति' का प्रयोग किया:भीष्म: उन्होंने शिखंडी को आगे कर भीष्म की मृत्यु का मार्ग प्रशस्त किया।द्रोण: 'अश्वत्थामा हतो हतः' के माध्यम से द्रोण का शस्त्र त्याग करवाया।कर्ण और जयद्रथ: प्रकृति के नियमों (जैसे सूर्यास्त का भ्रम) और कर्ण के कवच-कुंडल की योजना बनाकर पांडवों की रक्षा की।संदेश: कृष्ण ने सिखाया कि जब लड़ाई 'अधर्म' के खिलाफ हो, तो सूक्ष्म नीति और कूटनीति का सहारा लेना गलत नहीं है।४. कर्मों का संतुलन (Law of Karma)कृष्ण की भूमिका एक न्यायाधीश जैसी भी थी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हर पात्र को उसके कर्मों का फल मिले।उन्होंने दुर्योधन को शांति का अंतिम अवसर (शांतिदूत बनकर) दिया, ताकि इतिहास यह न कहे कि युद्ध टालने की कोशिश नहीं की गई।उन्होंने गांधारी के शाप को भी सहर्ष स्वीकार किया, जो यह दिखाता है कि ईश्वर भी कर्म के सिद्धांतों का सम्मान करता है।५. समय और काल के स्वामी (The Eternal Witness)युद्ध के दौरान जब अर्जुन हिचकिचाए, तब कृष्ण ने अपना 'विश्वरूप' दिखाया।भूमिका: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ही काल (Time) हैं और ये सभी योद्धा पहले ही उनके द्वारा मारे जा चुके हैं, अर्जुन तो केवल एक 'निमित्त' (Medium) है। यह उनकी असली भूमिका थी—यह बताना कि संसार में जो कुछ हो रहा है, वह ईश्वरीय योजना का हिस्सा है।संक्षेप में:कृष्ण की भूमिकाप्रतीकसारथीजीवन के रथ को सही दिशा देने वाले गुरु।शांतिदूतसंघर्ष को टालने का अंतिम प्रयास करने वाले मध्यस्थ।योगेश्वरज्ञान और कर्म का संतुलन सिखाने वाले।निमित्त निर्माताअर्जुन को केवल एक माध्यम बनाकर अधर्म का विनाश करने वाले।कृष्ण की भूमिका यह सिखाती है कि जब जीवन एक युद्ध क्षेत्र बन जाए, तो भावनाओं में बहने के बजाय विवेक (Intellect) को अपना सारथी बनाना चाहिए।