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प्रतापेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में छतरपुर के राजा प्रताप सिंह ने करवाया था। यह मन्दिर चन्देल स्थापत्य कला से अलग हिन्दू और मुस्लिम मिश्रण शैली में बना है। मन्दिर को देखकर एक प्रश्न आता है कि ऐसा मन्दिर क्यों बनाया गया क्या राजा प्रताप सिंह मुगलों को खुश करना चाहते थे? नहीं ऐसा बिल्कुल भी नही है। 19वीं शताब्दी आते-आते मुगलों का साम्राज्य बिल्कुल पतन की तरह आ चूका था। मुगलों के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर दिल्ली के एक छोटे से भूभाग के बादशाह बन कर रह चुके थे। अंग्रेजों ने उनके लगभग राज पर कब्जा कर लिया था। 1857 की क्रान्ति के बाद बहादुर शाह जफर को बंदी बना रगुंन भेज दिया था। उस समय तक इस्लाम बहुत फैल चुका था उसका सम्मान करते हुए यह मन्दिर मिश्रित शैली में बनाया गया। ये फर्क होता है मन्दिर बनाने वालो में और मन्दिर तुड़वाने वालों में। अमर उजाला अखबार के अनुसार मुगलों के शासन काल 60,000 मन्दिरों को तोड़ा गया। शाहजहां ने एक साथ बनारस के 76 मन्दिरों को तोड़ने का आदेश दिया था। अकबर भी कोई अच्छा शासक नहीं था।हमें गलत इतिहास पढ़ाया गया है। कांग्रेस के शासन काल में जितने भी शिक्षा मंत्री हुए वो लगभग मुसलिम थे उन्होंने ने ग़लत इतिहास पढ़ाया और लागू करवाया। कुछ लोग औरंगजेब को अपना हिरो मानते हैं मैं उनको बताना चाहता हूं कि औरंगज़ेब किसी भी मायने में हिरो मानने लायक़ है।अगर किसी मुस्लिम को हिरो मानना है तो डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम साहब को हिरो मानिए जिन्होंने अपना सारा जीवन अपने देश को दिया है जो मेरे भी हिरो हैं। #एकऐसामन्दिरजोहिन्दूऔरमुस्लिममिश्रितशैलीमेंबनाहै #खजुराहोकाप्रतापेश्वरशिव #विचित्रभारत #रामधारीसिंह #खजुराहो #बहुतफर्कहोताहैमन्दिरबनानेवालोऔरमन्दिरतुड़वाने वालोंमें