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रावण — जिसे इतिहास ने राक्षस कहा, पर क्या वह केवल राक्षस था? इस वीडियो में जानिए रावण और योग की आत्मा — जहाँ शक्ति, ज्ञान, अहंकार और आत्मबोध का संघर्ष दिखाई देता है। रावण केवल लंका का राजा नहीं था, वह वेदों का ज्ञाता, शिव भक्त और एक महान योगी भी था। तो प्रश्न उठता है — 👉 क्या रावण खुद को जीत पाया? 👉 क्या योग अहंकार से बड़ा था? यह कथा केवल त्रेतायुग की नहीं, यह हर उस मानव की कहानी है जो अपने भीतर के रावण से लड़ रहा है। 📿 यह वीडियो प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक दर्शन पर आधारित है। ✨ ऐसी ही भारतीय प्राचीन ज्ञान कथाओं के लिए चैनल को Subscribe करें। || रावण और योग की आत्मा || एक सिनेमाई पौराणिक कथा में ज्ञान और अंतर्द्वंद्व की खोज स्थान त्रेतायुग का लंका सोने से बनी राजप्रासादों की नगरी समुद्र की लहरें सूर्य की किरणों में चमकती हैं कथा प्रारंभ लंका का सिंहासन ऊँचा गहरे नीले नीलम से जड़ा हुआ उसके केंद्र में बैठा था रावण दस सिरों में से एक ही प्रकट था बाकी शांत थे भीतर विलीन यह वह रावण था जिसे आम जन केवल राक्षस समझते हैं परंतु आज वह राजा नहीं योद्धा नहीं अपहरणकर्ता नहीं आज वह योगी था उसकी त्वचा धूप में निखरी गहरी सुनहरी भूरी लंबी काली जटाएं आधी बंधी आधी बहती जैसे समय के प्रवाह को थामे हों आंखों में गहराई थी जैसे भीतर सागर हो और किनारे अब भी तय नहीं हुए भव्य चेहरा नुकीली नाक और एक सुव्यवस्थित दाढ़ी सब मिलकर एक ही बात कहते यह मनुष्य साधारण नहीं है रावण जो चारों वेदों का ज्ञाता था संगीत का उस्ताद और एक श्रेष्ठ शिव भक्त अब सिंहासन से उतर समुद्र किनारे एकांत में बैठा था योगासन में वह नाड़ी शुद्धि कर रहा था श्वास भीतर शिव श्वास बाहर मैं नहीं पार्श्व में लंका के सैनिक युद्ध की योजनाएँ बना रहे थे परंतु रावण आँख मूँदे स्थिर था एक समय था जब उसकी आत्मा को केवल शक्ति चाहिए थी अब उसे चाहिए था शांति मुझमें दस सिर हैं वह बुदबुदाया पर एक हृदय और वह अब भी अशांत है तभी दूर से एक ऋषि आता है अगस्त्य रावण ऋषि कहते हैं तुमने योग का अभ्यास शुरू किया है परंतु क्या तुम जान पाओगे उसका वास्तविक अर्थ रावण ने आंखें खोली वह ऋषि को देख मुस्कराया एक ऐसी मुस्कान जो गूढ़ थी पर थकी हुई भी मैं युद्ध जीत चुका वह बोला देवों को हराया मृत्यु को समझा शिव को प्रसन्न किया पर अपने भीतर के रावण से न हार सका न उसे समझ सका यही मेरा योग है अपने भीतर की अग्नि से एक होना ऋषि अगस्त्य ने उसे देखा वह अब केवल एक राजा नहीं साधक था योग केवल शरीर की स्थिरता नहीं यह आत्मा का अनुशासन है रावण ने आंखें मूँद लीं मैं जानता हूँ ऋषिवर कि मेरा मोह मेरी वासना मेरा अहंकार ये सब मेरे दस सिर हैं योग मुझे उन्हें काटने की कला सिखा रहा है बिना खड्ग उठाए फ्लैशबैक वह क्षण जब उसने सीता का हरण किया वह शक्ति का क्षण नहीं था वह कमज़ोरी का क्षण था आज उसे उसका अहसास हो रहा था अब वह हर सुबह समुद्र किनारे बैठता प्राणायाम करता सूर्यनमस्कार करता उसका बल जो पहले तलवार में था अब श्वास में था एक दृश्य रावण वीरभद्रासन में खड़ा है उसका शरीर स्थिर परंतु चेहरे पर भाव हैं शिव का रौद्र रूप और उसी में करुणा भी एक शिष्य युवा योद्धा मकराक्ष उससे पूछता है राजन क्या यह योग युद्ध की तैयारी है रावण मुस्कराता है यह युद्ध नहीं यह अंतर्ज्ञान है जो स्वयं को जान ले वही सच्चा विजेता है संगीत की मधुर स्वर लहरियाँ हवाओं में घुल जाती हैं रावण का रुद्रवीणा बजाना जैसे ब्रह्मांड को कंपन में ला रहा हो वह कथा सुनाता है अपनी ही रावण की कथा रावण की जुबानी लेकिन इस बार वह खलनायक नहीं मानव है अधूरेपन की पहचान वाला कथा वहीं समाप्त होती है जहां से वह शुरू होती है रावण समुद्र किनारे ध्यानस्थ लंका की चकाचौंध पीछे छूट चुकी है सामने बस एक प्रश्न है क्या मैं स्वयं को जीत पाया धीरे धीरे संगीत थमता है समुद्र शांत होता है रावण की साँसें स्थिर हैं कथा समाप्त नहीं वह अभी चल रही है हर उस मानव में जो अपने भीतर के रावण से लड़ रहा है