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सत्य की अग्नि: रोहिताश्व की मृत्यु और रानी शैव्या का असहनीय दुःख! - राजा हरीशचंद्र– महाकाव्य कथा - Part 5 नमस्कार मित्रों, मैं हूँ छोटा वाणी, और आप सुन रहे हैं Shlok Sarita — जहाँ सत्य की राह कभी फूल नहीं बिछाती, पर अंत में जीवन को दिव्यता तक पहुँचा देती है। पिछले भाग में हमने देखा— हरीशचंद्र का श्मशान में कार्य, काल रक्षक की कठोर परीक्षा, और सत्य निभाने का उनका अडिग संकल्प। अब कथा बढ़ने वाली है— इतिहास की सबसे मार्मिक, सबसे करुण और सबसे गंभीर परीक्षाओं में। हरीशचंद्र श्मशान के सेवक बन चुके हैं। रानी शैव्या और रोहिताश्व भूख से कमजोर, पर सत्यधीश राजा का साथ निभा रहे हैं। और अब— भाग्य एक ऐसा मोड़ लाता है जहाँ हृदय टूटने की आवाज़ तक सुनाई देती है। एक रात शैव्या अपने छोटे पुत्र रोहिताश्व को गले लगाकर बैठी थीं। रोहिताश्व के शरीर पर बुखार चढ़ चुका था। रानी शैव्या कहती हैं— “बेटा, तुम्हें क्या हो रहा है? तुम्हारा माथा तो तप रहा है…” रोहिताश्व कमज़ोर स्वर में— “माता… भूख लगी है… और बहुत ठंड लग रही है…” शैव्या रोते हुए— “हे देव! इस मासूम पर इतनी कठोर परीक्षा क्यों?” वहीं दूसरी ओर हरीशचंद्र श्मशान में रात्रि की ड्यूटी कर रहे थे— उन्हें अपने पुत्र की स्थिति का अभी तक पता नहीं था। अगली सुबह शैव्या रोहिताश्व को गोद में उठाकर काशी की गलियों में दवा और भोजन माँगने निकलती हैं। लेकिन गरीब से गरीब और दुखी से दुखी लोग उन्हें देखते हुए कहते— “क्या यह वही रानी है जो कभी राजा के महल में रहती थी?” कोई भोजन नहीं देता। कोई दवा नहीं देता। कुछ लोग ताने मारते— “सत्य? तो लो अब सत्य! अब तुम्हारा सत्य तुम्हारे बच्चे को खिलाएगा क्या?” शैव्या कांपते हुए कहती हैं— “भगवान के लिए मेरे बच्चे को बचा लो!” लेकिन किस्मत कठोर थी। शाम होते-होते रोहिताश्व की साँसें धीमी होने लगीं। शैव्या उसे अपनी गोद में लेकर काँपते हुए कहती हैं— “बेटा, पिताश्री आ रहे हैं… बस थोड़ा रुक जाओ…” रोहिताश्व मुस्कुराने की कोशिश करता है— “माता… मैं थक गया हूँ…” और फिर— एक लंबी साँस लेकर वह शांत हो जाता है। शैव्या चीख उठती हैं— “रोहिताश्व!! मेरे लाल!! मेरी आँखों का तारा!!! तुम मुझे ऐसे छोड़कर कैसे चले गए…?” उनकी चीख काशी की गलियों में दर्द की नदी बन जाती है। रात को हरीशचंद्र श्याम-धुंध में श्मशान लौटते हैं। दूर शैव्या अपने पुत्र का शव लेकर श्मशान की ओर बढ़ रही थीं। वह रोते हुए कहती हैं— “स्वामी… हमारा बेटा… अब नहीं रहा…” हरीशचंद्र सुनते ही पत्थर बन जाते हैं। उनकी आँखें सुक्खी हो जाती हैं। हृदय कपाल की तरह फटने लगता है। लेकिन उन्हें याद आता है— वे श्मशान के सेवक हैं। यहाँ दाह-संसकार शुल्क के बिना किसी को आग नहीं दी जा सकती। रक्षक काल उनके सामने आकर कहते हैं— “सेवक! नियम तो जानते हो। दाह-संसकार से पहले शुल्क लो।” रानी शैव्या विनती करती हैं— “यह मेरा अपना पुत्र है! क्या मैं अपने ही बेटे का दाह करने के लिए पैसा दूँ?” काल— “श्मशान किसी का नहीं होता। नियम सब पर समान हैं।” हरीशचंद्र अपने ही स्वर में कंपकंपाहट महसूस करते हुए कहते हैं— “शैव्या… नियम धर्म है। मैं… शुल्क लिए बिना रोहिताश्व का अंतिम संस्कार नहीं कर सकता…” शैव्या चिल्लाती हैं— “स्वामी!! क्या एक माँ अपने ही बेटे का शव खरीदकर लाएगी??” हरीशचंद्र कहते हैं— “मैं राजा नहीं… श्मशान का सेवक हूँ। मेरे हाथ बँधे हैं। सत्य मुझे रोक रहा है…” शैव्या अपने शरीर पर पहना एकमात्र वस्त्र फाड़कर एक टुकड़ा देती हैं। रानी शैव्या कहती हैं— “लो स्वामी… यह मेरा वस्त्र है। इसे बेचकर हमारे बच्चे का दाह-संसकार कर दो।” हरीशचंद्र काँपते हुए— “शैव्या… यह कैसे स्वीकार करूँ? यह तो तुम्हारी मर्यादा है…” शैव्या— “आज मर्यादा क्या है, स्वामी? मेरा बेटा सामने पड़ा है— और उसका पिता उसे आग देने की अनुमति नहीं दे सकता…” स्वर्ग के देवताओं तक यह दृश्य पहुँच जाता है। इंद्र बोलते हैं— “मानव इतना सत्यप्रिय कैसे हो सकता है?” यमराज कहते हैं— “यह सत्य का ऐसा दीपक है जो मृत्यु को भी झुका देगा।” अंत में रानी का वस्त्र शुल्क के रूप में स्वीकार किया जाता है। रानी रोहिताश्व को धीरे-धीरे हरीशचंद्र के हाथों में देती हैं। उनका स्वर टूट चुका है— “स्वामी… अब हमारे पुत्र को शांति दे दीजिए…” हरीशचंद्र रोहिताश्व को अंतिम बार सीने से लगाते हैं। उनकी आँखों से दो अश्रु-बिंदु गिरते हैं… और अग्नि प्रज्वलित हो जाती है। शैव्या धरती पर गिरकर चिल्लाती हैं— “रोहिताश्व!!! मेरे प्राण!!!” काशी का आकाश उस रात करुणा से काँप उठता है। 🙏 धन्यवाद मित्रों, आज का अध्याय— राजा हरीशचंद्र की सबसे कठोर परीक्षा और मानव इतिहास की सबसे दर्दनाक क्षणों में से एक था। बताइए— आपके हृदय को किसने सबसे गहराई से छुआ? 🔹 रोहिताश्व का बीमारी और अंतिम पल? 🔹 रानी शैव्या की चीखें? 🔹 हरीशचंद्र का नियम के आगे झुकना? 🔹 अपने ही पुत्र का शुल्क लेना? 🔹 या वह अंतिम दाह-संस्कार? कमेंट में ज़रूर लिखें— आपकी पंक्तियाँ Shlok Sarita का प्रकाश बनती हैं। अगर यह एपिसोड आपके दिल को छू गया— तो कमेंट, लाइक, शेयर, और सब्सक्राइब करना न भूलें। 🌸 अगले भाग (Part 6) में— कथा पहुँचेगी— ⚡ विश्वामित्र का एक और कठोर प्रहार 🪔 सत्य की चरम परीक्षा 👑 देवताओं का हस्तक्षेप 🔥 और वह क्षण जो हरीशचंद्र को “सत्य का चंद्रमा” बनाता है। फिर मिलेंगे अगले श्लोक संवाद में— तब तक के लिए राम राम! जुड़े रहिए Shlok Sarita के साथ — जहाँ हर श्लोक… एक कहानी बनता है। #meditation #shots #slokas #ramayan #bhagwatkatha #hindu #hindistories #viral #viralvideo #viralreels #shloka #shlokSarita #vrindavan @ShlokSarita / @shloksarita Subsribe me : / @shloksarita